नई दिल्ली: म.प्र में सत्ता से दूर रहने का वनवास खत्म होने के बाद बीजेपी को हराने वाली कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि आखिर वह सूबे का मुख्यमंत्री किसे बनाए? मगर काफी माथापच्ची और सियासी बैठकों के बाद आखिरकार गुरुवार की रात यह फैसला हो गया कि कमलनाथ ही राज्य के मुख्यमंत्री होंगे. दरअसल, मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे. एक कमलनाथ और दूसरे ज्योतिरादित्य सिंधिया. मगर कांग्रेस हाईकमान ने काफी सोच-समझने के बाद कमलनाथ के नाम पर मंजूरी दे दी. हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस ने यह फैसला आगे की रणनीति और बीजेपी से एक डर को भी ध्यान में रखकर लिया है.

ऐसी खबरें थीं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे और युवा की बात करने वाले राहुल गांधी उन्हें सीएम बना सकते थे, मगर ऐसा नहीं हुआ. वहीं राज्य में नवनिर्वाचित विधायक और पार्टी नेता कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे. कुर्सी एक और दावेदार दो. अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि आखिर दो दावेदारों में से किसे राज्य का मुखिया बनाया जाए, जिससे बीजेपी को किसी तरह से बाजी पलटने से रोका जा सके. इसलिए कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले की घड़ी में युवा जोश के बदले अनुभव को तरजीह दी. वैसे भी मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के नाम पर युवा जोश बनाम अनुभव की ही लड़ाई थी.

ऐसा माना जा रहा है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को 'अनुभव' पर भरोसा करने के लिए कहा है, क्योंकि यहां जीत काफी कम अंतर से मिली है और एक मंझा हुआ राजनेता ही उस स्थिति से अच्छी तरह निपट सकता है. इसके पीछे तर्क यह भी दिए जा रहे हैं कि जीत का अंतर कम होने की वजह से बीजेपी कभी भी बाजी को पलट सकती है. हालांकि, यह भी सच है कि बीजेपी 2019 लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जो उसकी छवि को नुकसान पहुंचाए. बावजूद इसके कांग्रेस कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है. यही वजह है कि कांग्रेस ने कमलनाथ पर ज्यादा भरोसा किया, क्योंकि कमलनाथ के पास ज्योतिरादित्य सिंधिया से ज्यादा अनुभव है और वह सियासत की बारीकियों को काफी करीब से समझते हैं. 
बताया यह भी जा रहा है कि अगर कांग्रेस के भीतर बीजेपी का डर नहीं होता तो वह ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम पर मुहर लगा सकती थी. मगर उसे डर था कि कम अंतर से जीत के कारण बीजेपी कहीं कोई रणनीति न बनाए और कांग्रेस को सत्ता से दूर करने की कोई चाल न चले. क्योंकि कांग्रेस ऐसा मान रही है कि अगर ऐसी स्थिति राज्य में उत्पन्न होती तो फिर कमलनाथ से बेहतर शख्स कोई नहीं हो सकता जो मुश्किल हालात को आसानी में बदल दे. यही वजह है कि अनुभव के आधार पर कमलनाथ को सीएम की कुर्सी दी गई. 
भी कहा जा रहा है कि कमलनाथ का सियासी करियर अब अपने अवसान पर है और ज्योतिरादित्य सिंधिया का अभी काफी बचा है. यही वजह है कि कांग्रेस ने अपने कद्दावर नेता को मुख्यमंत्री बनाया. क्योंकि इस बार अगर कमलनाथ को मुख्यमंत्री नहीं बनाती कांग्रेस तो फिर एमपी में समीकरण और भी उलझ सकते थे. बता दें कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 114 सीटें मिली हैं. मगर वहां सपा-बसपा और निर्दलीय के समर्थन से बहुमत के आंकड़े से काफी आगे हैं. 

भोपाल। सरकार कर्मचारियों के लिए एक बार फिर एक बड़ी खुशखबरी आ रही है। दरअसल 7वें वेतन आयोग और उससे संबंधित मामलों पर कुछ ऐसी खबरें आ रही है जों केंद्रीय कर्मचारियों के चेहरे पर मुस्कान ला सकती हैं। नई खबर के मुताबिक राष्ट्रीय पेंशन योजना में केंद्र के योगदान पर केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले से सीजी कर्मचारियों को कुछ राहत मिल सकती है।


चर्चा है कि राष्ट्रीय पेंशन योजना में केंद्र का योगदान अब 10 प्रतिशत के बजाय 14 प्रतिशत करने का निर्णय लिया जा चुका है। इससे 18 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को फायदा होगा। इसके अलावा वापसी में 60 प्रतिशत कर से छूट भी दी जाएगी। वहीं दूसरी जो बात समने आ रही है उसके अनुसार सीजी(central govt.) कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर वेतन वृद्धि मिलेगी।


वहीं ये बात सामने आते ही मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल सहित विभिन्न जिलों में कार्यरत केंद्रीय कर्मचारियों के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई है।


न्यूनतम सैलरी को बढ़ाना जरूरी है। सुना है 2019 में सरकार ये करने जा रही है, जो काफी खुशी की बात है। लेकिन न्यूनतम सैलरी 26,000 रुपए महीने होनी ही चाहिए।
- पीके शर्मा, रिटायर्ड केंद्रीय कर्मचारी


 


 


कई बार सीनियर्टी के चलते ऐसे लोग आगे बढ़ जाते हैं, जो नियमों तक को पूरी तरह नहीं समझते। ऐसे में वे लोग जो मेहनती हैं उन्हें यदि प्रदर्शन के आधार पर वेतन वृद्धि मिलेगी, तो यह सबसे अच्छा निर्णय है।
- आर उपाध्याय, केंद्रीय कर्मचारी


न्यूनतम सैलरी हो या अच्छे प्रदर्शन के आधार पर वेतन वृद्धि दोनों ही निर्णय यदि सरकार लेती है। तो ये बहुत अच्छा रहेगा। इससे एक ओर जहां योग्य व कर्मठ कर्मचारी को लाभ होगा, वहीं न्यूनतम सैलरी के चलते कर्मचारियों को होने वाली परेशानी में भी कमी आएगी।


- एलके सक्सैना, केंद्रीय कर्मचारी


ये है योजनाः 
सरकारी कर्मचारियों के लिए जनवरी 2004 में एनपीएस योजना को लॉन्च किया गया था। वहीं 2009 में इसे सभी वर्गों के लिए खोला गया। इसके बाद सातवें वेतन आयोग ने सचिवों की एक समिति की स्थापना के लिए सिफारिश की, जिसके चलते समिति गठित की गई और उसकी 2018 में रिपोर्ट आई। कैबिनेट ने इस फैसले को मंजूरी देने के मसौदे के आधार पर किया था।


ऐसे होता है केंद्रीय कर्मचारियों को लाभ:
योजना के मुताबिक एनपीएस टीयर-1 के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों के लिए सरकारी योगदान 10 से 14 प्रतिशत तक बढ़ गया है। जिसमें पेंशन फंडों के चयन के लिए व्यक्तियों के पास अब चुनाव की स्वतंत्रता होगी।


नियमों के मुताबिक कुल संचित कोर का 40 प्रतिशत सेवानिवृत्ति पर वार्षिकी खरीदने या 60 वर्ष की आयु तक पहुंचने के लिए पहले ही टैक्स छूट दी गई थी। इसके अलावा सेवानिवृत्ति के समय एनपीएस ग्राहक द्वारा निकाले गए जमा कॉर्पस में से 60% में से 40% कर छूट भी थी।


कर्मचारियों की वेतन वृद्धि के बारे में योजनाः 
सूत्रों के अनुसार 2019 से शुरू होने पर सरकार कर्मचारियों की पदोन्नति और वेतन वृद्धि का फैसला करने के लिए एक नई विधि स्थापित करेगी। जिसमें सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर, सीजी कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर वेतन वृद्धि मिलेगी।


इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जनता के लिए ऑनलाइन कर्मचारी को रेट करने का विकल्प भी दिया जाएगा। जिसका ध्यान प्रचार और वृद्धि पर निर्णय लेने के समय किया जाएगा।


7वां वेतन आयोग: कर्मचारियों को मोदी का तोहफा, नई विधि से होगी पदोन्नति!
सामने आ रही सूचना के अनुसार सातवें वेतन आयोग (7th Pay Commission) की सिफारिशों के अनुसार केंद्र सरकार कर्मचारियों की वेतन वृद्धि और पेंशन से लेकर कर में छूट की दरों में भी बढ़ोतरी करने जा रही है। इसके अलावा ये भी चर्चा है कि नए साल पर मोदी सरकार केंद्रीय कर्मचारियों की पदोन्नति के लिए एक नई विधि स्थापित करेगी। सरकार की इस योजना का सीधा फायदा कर्मचाकरियों को मिलेगा।


18 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को होगा फायदा...
राष्ट्रीय पेंशन योजना में केंद्र का योगदान अब 10 प्रतिशत के बजाय 14 प्रतिशत होगा। इससे 18 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को फायदा होगा। इसके अलावा कर्मचारियों को 60 फीसदी तक कर से छूट भी दी जाएगी।


ज्ञात हो कि एनपीएस एक सरकारी प्रायोजित योजना है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए जनवरी 2004 में लॉन्च होने के बाद 2009 में सभी वर्गों के लिए खोल दी गई।


ये है केंद्रीय कर्मचारियों की मांग...
दरअसल सूत्रों के अनुसार केंद्रीय कर्मचारियों की मांग है कि उनकी सैलरी को बढ़ाया जाए। कर्मचारी चाहते हैं कि उनकी न्यूनतम सैलरी को बढ़ाकर 26,000 रुपए महीने कर दिया जाए। इसके अलावा फिटमेंट फेक्टर को भी 2.57 गुने से बढ़ाकर 3.68 गुना कर दिया जाए।


जनता करेगी कर्मचारियों को रेट!...
केंद्रीय कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार कई तरह के लाभ दे रही है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर, सीजी कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर वेतन वृद्धि मिलेगी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जनता के लिए ऑनलाइन कर्मचारी को रेट करने का विकल्प भी दिया जाएगा।




भोपाल। मध्य प्रदेश में 17 दिसंबर को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ कमलनाथ ही मुख्यमंत्री पद शपथ लेंगे। बाकी मंत्रियों को अभी इंतजार करना होगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार मंत्रालयों के बटवारें पर अपनी बात नहीं पाई है। ऐसे में नए मंत्रिमंडल की शपथ बाद में होगी।

कमलनाथ 17 दिसंबर को दोपहर 1:30 बजे भेल के जंबूरी मैदान पर मध्य प्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। इसके अलावा कमलनाथ के मंत्रियों के नाम पर मंथन शुरू हो गया है। उधर भोपाल स्थित भेल के जंबूरी मैदान में शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां तेज हो गई हैं। शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए दिग्गज हस्तियों को आमंत्रित किया गया है। आयोजन स्थल का जायजा शुक्रवार देर रात से ही अधिकारियों ने शुरू कर दिया है। आयोजन स्थल में समारोह की तैयारी का सिलसिला तेज़ हो गया है।

शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी समारोह में शिरकत करेंगे। कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह के बहाने कांग्रेस महागठबंधन की ताकत दिखाना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी इस समारोह में शिरकत के लिए ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू, अरविंद केजरीवाल को न्योता भेज रही है।

कमलनाथ ने कहा कि कांग्रेस की शक्ति प्रदर्शन की कोई योजना नहीं है लेकिन उनके शपथ ग्रहण में कई विपक्षी पार्टियों के नेता शामिल हो सकते हैं। कमलनाथ ने कहा, 'तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत ने महागठबंधन को ताक़त दी है। शपथ ग्रहण में हम सबको बुला रहे हैं, यह कोई शक्ति प्रदर्शन हीं है, आप इसे विपक्षी एकता का प्रदर्शन कह सकते हैं।

भोपाल। एक तरफ कांग्रेस सत्ता में आते ही अपने कर्जमाफी के वादे को पूरा करने मे जुटी हुई है, वही दूसरी तरफ प्रदेश के पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया ने कांग्रेस के इस फैसले पर सवाल उठाए है। उन्होंने कर्जमाफी की इस घोषणा को प्रदेश के लिए आर्थिक संकट बताया है। मलैया का कहना है कि पहले ही प्रदेश में वित्तीय स्थिति ठीक नही है ऐसे में कर्जमाफी से प्रदेश के खजाने की स्थिति और गंभीर हो जाएगी।आने वाले समय में वेतन के लाले पड़ जाएंगे।

दरअसल, मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान लगातार किसानों की कर्जमाफी की बात कही थी।इसे उन्होंने अपने वचन पत्र में शामिल भी किया था। अब जबकि प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है, तो किसानों की कर्जमाफी की बात भी जोर पकड़ रही है। इसी बीच कमलनाथ की ताजपोशी से पहले प्रदेश के वित्तमंत्री रहे जयंत मलैया ने कहा कांग्रेस पर हमला बोला है। उन्होंने कर्जमाफी को प्रदेश में आने वाला आर्थिक संकट बताया है। उन्होंने कांग्रेस के कर्जमाफी के वादे से प्रदेश के खजाने की स्थिति गंभीर हो जाने की बात कही है। साथ ही उन्होंने कहा कि इस कदम से प्रदेश में वेतन के लाले पड़ जाएंगे।

जैसा हमें खजाना मिला था हमने वैसा ही लौटाया 

इसके साथ ही कांग्रेस द्वारा मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठाने औऱ श्ववेत पत्र लाने पर मलैया ने कहा कि 15 साल पहले कांग्रेस ने जिस हालत में खजाना दिया था,आज हमने भी उन्हें वैसी ही स्थिति में लौटाया है। उन्होंने कहा कि मप्र पर राष्ट्रीयकृत बैंकों का 34 से 36 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बाकी है। सब कुछ मिलाकर देखा जाए तो मप्र एक लाख 65 हजार करोड़ रुपए के कर्ज में है और करीब दो हजार करोड़ रुपए का आेवर ड्रॉफ्ट है। यदि कर्जमाफी होती है तो विकास के सारे काम बंद हो जाएंगे।

2 लाख तक का कर्जा होगा माफ

कांग्रेस अपने वादे के मुताबिक किसानों का कर्ज माफ करने जा रही है। इसके लिए शासन स्तर पर कवायद शुरू हो गई है। इस संबंध में बैंकों से कर्जमाफी का ब्योरा मांगा गया है। किसानों पर जो कर्ज है, वह सहकारी बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंक, ग्रामीण विकास बैंक और निजी बैंकों का है।  सहकारिता अधिकारियों ने बताया कि हमारे पास 40.96 लाख किसानों पर 56 हजार करोड़ का कर्ज होने का अनुमान है।  कर्जमाफी के ब्लूप्रिंट में 2 लाख तक का कर्जा माफ करने की योजना है। कर्जमाफी के दायरे में सहकारी और राष्ट्रीयकृत बैंक दोनों आएंगे। कर्जमाफी का फायदा ओवरड्यू और समय पर लेनदेन करने वाले किसानों को कर्ज खाते में वर्तमान कर्जराशि के आधार पर माफी मिलेगी। कर्जमाफी से राज्य पर करीब 60 हजार करोड़ रुपए का वित्तीय भर आएगा। कर्जमाफी के ब्लूप्रिंट में माफी के लिए राशि जुटाने का जरिया भी शामिल है। 

राजस्थान में भाजपा की हार का जिम्मेदार कौन? इस नतीजे की उम्मीद इस राज्य में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के उलट पहले से ही थी। सत्तारूढ़ पार्टी की हार के लिए एंटी इंकमबेंसी से ज्यादा सिर्फ और सिर्फ वसुंधरा राजे मानी जाएंगी। सत्ता के सेमी फाइनल कार्यक्रम के जरिए जनता का मन टटोलने के लिए अमर उजाला की टीम ने पूरे राजस्थान का दौरा किया। लोगों से चाय पर चर्चा या स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ बहस में एक बात सबसे अटपटी लगी कि प्रदेश की रानी दिलों की रानी न बन सकीं। 

वसुंधरा भाजपा की हार की पहली और आखिरी कील साबित होंगी इस बात का एहसास राजधानी जयपुर में ही लग गया था। गौरव यात्रा के दौरान वो अपनी उपल्ब्धियां गिनाती रहीं लेकिन जनता फिर भी उदास नजर आई। अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को नाराज कर परेशान करने में उन्होनें कोई कसरनही छोड़ी। घनश्याम तिवाड़ी ने अलग पार्टी का गठन कर लिया और कहा कि रानी का घमंड भाजपा को उखाड़ फेंकेगा।

आश्चर्यचकित करने वाली बात ये भी थी कि घनश्याम तिवाड़ी सरीखे कई वरिष्ठ और जनाधार वाले नेताओं ने जब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को इस बात से अवगत कराया तो उन्होने सभी की शिकायत को जायज ठहराते हुए वसुंधरा के खिलाफ कोई भी कदम उठाने ने साफ मना कर दिया।राजस्थान में कानाफुसी इस बात की थी पीएम मोदी और अमित शाह दोनों ही चाहते थे कि वसुंधरा हार जायें इसलिए टिकट बंटवारे में सिर्फ मैडम की चली।

रानी से आम लोगों में नाराजगी इस बात की थी कि वो सिर्फ जयपुर की रानी हैं, वही बैठती हैं और चापलूसों से घिरी रहती हैं। संगठन के कार्यकर्ताओं से मिलना तो दूर कई वरिष्ठ ऐसे भी मिले जिन्हे बेइज्जत करके अपने दरबार से सीएम ने बैरंग लौटा दिया। लोगों से मिलने की फुरसत उन्हे नहीं थी। जगह-जगह लाभार्थी सम्मेलन का आयोजन करना भी उल्टे नमक छिड़कने का काम कर गया ।भामाशाह जैसी योजनाओं से जिन लोगों को लाभ हुआ उन्हें चुनाव का हथियार बनाया गया जिसे लेकर लोगों में काफी रोष दिखा।

सरकार सभी काम करती है लेकिन ऐसा कर वो अपनी जनती पर ऐहसान नहीं करती,शायद ये बात राजघराने की मुख्यमंत्री न समझ पाई। चुनाव में जीत हासिल करना एक परीक्षा में उत्तीर्ण होने जैसा होता है और सत्ता में वापसी करने के लिए काम के अलावा लोगों के दिल में जगह बनाने का हुनर भी आना चाहिए।शायद सत्ता का मद ही ऐसा होता है कि वसुंधरा राजे सरीखे दिग्गज भी इतनी सरल और अच्छी बात भूल जाते हैं लेकिन जनता जनार्दन हर पांच साल बाद ये सबक सीखाने को तैयार रहती है।



भोपाल। शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र सिंह यादव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को सीएम बनाने के लिए अपनी सीट छोड़ने का ऐलान किया था परंतु आज चुनाव के नतीजे आने से पहले ही मुंह लटकाकर मतगणना से बाहर निकलते नजर आए। 

शिवपुरी जिले की कोलारस विधानसभा सीट पर हाल ही में उपचुनाव हुए थे। सीएम शिवराज सिंह ने इस सीट को जीतने में पूरी ताकत लगा दी थी परंतु ज्योतिरादित्य सिंधिया के गांव गांव जनसंपर्क ने शिवराज सिंह की सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया। महेंद्र यादव यहां से विधायक चुने गए थे। 2018 के चुनाव में सिंधिया ने फिर से उन्हे टिकट दिया। 

कोलारस के यादव समाज में महेंद्र यादव का भारी विरोध था, बावजूद इसके उन्होंने ना केवल टिकट मांगा बल्कि सिंधिया को गारंटी दी कि वो जीतकर दिखाएंगे। इतना ही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान महेंद्र यादव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने एक जनसभा में ऐलान किया कि वो यह सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए जीतेंगे। जीतते ही 16 दिसम्बर को इस्तीफा दे देंगे ताकि ​सिंधिया सीएम बन सकें।

समाजवादी पार्टी से बगावत करके अपनी नई पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाने वाले शिवपाल यादव ने लखनऊ में जनाक्रोश रैली के जरिए अपनी ताकत दिखाई. इस दौरान शिवपाल ने कहा कि अयोध्या में विवादित जमीन पर बाबरी मस्जिद के स्थान पर मंदिर नहीं बनना चाहिए. राममंदिर बनाना है तो सरयू के किनारे बनाओ, लेकिन बाबरी मस्जिद के स्थान पर मंदिर नहीं बनना चाहिए. एक बार फिर साम्प्रदायिक शक्तियां फिर सिर उठा रही है, मुझे लगता है मुझे फिर से संघर्ष करना पड़ेगा.

बीजेपी को हटाने के लिए रैली बुलाई

शिवपाल ने कहा कि हमें बीजेपी को हटाने के लिए रैली की है. ये ऐतिहासिक दिन है जब दलित, पिछड़े, किसान, नौजवान इकट्ठा हुए हैं. ये रैली फैसला और परिवर्तन के लिए बुलाया गया है. बीजेपी की सरकार से सभी दुखी है, देश पर संकट है. हमें खुशी है कि पीएम मोदी का 56 इंच का सीना है, 4 साल में 2-4 इंच और बढ़ा लिया होगा. हमारे जवान शहीद हो रहे है, लेकिन हम एक इंच जमीन भी नहीं ले पाए.


उन्होंने कहा कि हमारे साथ छोटे छोटे दल भी मौजूद है, भारतीय किसान यूनियन के लोग है. नेताजी भी हमारे साथ बैठे हैं, उनके साथ 40 साल किया है. हम कभी अलग नहीं होना चाहते थे, मैंने कभी कुछ नहीं मांगा लेकिन ये नौबत क्यों आई, नेताजी ने जो आदेश दिया उसका पालन किया है. मैंने परिवार में भी चाहे बड़ा हो या छोटा है सबका आदेश माना है. पार्टी न टूटे इसका प्रयास मैन किया नेताजी ने भी किया लेकिन चापलूसों और चाटुकारों की वजह से ये नौबत आई.

मुलायम भी पहुंचे

खास बात है कि रमाबाई मैदान में पार्टी की ओर से आयोजित इस जनाक्रोश रैली में शिवपाल यादव के साथ सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी नजर आए. हालांकि, वह कार्यकर्ताओं के बर्ताव से दुखी दिखे.

मंच से मुलायम सिंह को याद दिलाया कि उनके आदेश से पार्टी बनाई

शिवपाल ने कहा कि मैंने प्रगीतिशील पार्टी बनाई नेताजी, आपसे पूछकर बनाई, आपके इजाजत से बनाई है, आपके सामने भगवती सिंह के सामने मैंने पूछा था और तब पार्टी बनाई है. जातियों को उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण मिले, जाति की जनगणना हो और उनकी तादात के हिसाब से आरक्षण तय हो. जिन्हें सम्मान नहीं मिल रहा हम उन्हें सम्मान देंगे, अपील करता हूं कि सभी छोटे दल हमारे पास आएं हम उन्हें अपने साथ लेंगे.

प्रत्याशी पार्टी तय करेगी

इससे पहले शिवपाल यादव ने आजतक से खास बातचीत में कहा था कि मुलायम सिंह अगर समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ते हैं, तो पार्टी उनके खिलाफ उम्मीदवार देगी या नहीं, इस पर पार्टी फैसला करेगी. वो अपनी पार्टी से मुलायम सिंह को मैनपुरी सीट लाना चाहते हैं, लेकिन अगर वो दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ते हैं, तो पार्टी उनके सलाह पर उम्मीदवार देगी या नहीं यह पार्टी तय करेगी.

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