पति की बेगुनाही साबित कराने बसपा विधायक रामबाई जुटा रही विधायकों का समर्थन


बसपा विधायक हत्याकांड की जांच एसआईटी से कराने के लिए 75 विधायकों का जुटा चुकी हैं समर्थन।

भोपाल। विधानसभा चुनाव के बाद लगातार सुर्खियों में मौजूद बहुजन समाज पार्टी की विधायक रामबाई अपने पति गोविंद सिंह की बेगुनाही के लिए विधायकों का समर्थन जुटा रही हैं। चार महीने पहले हुई देवेंद्र चौरसिया की हत्या के प्रकरण की छानबीन के लिए रामबाई अब एसआईटी गठित कराने की मांग कर रही हैं। उनका दावा है कि इसके समर्थन में वह भाजपा और कांग्रेस के 75 विधायकों के दस्तखत करा चुकी हैं।

'नवदुनिया" से हुई चर्चा में रामबाई ने कहा कि मैंने मुख्यमंत्री कमलनाथ से इस मामले में न्याय की मांग की है। इसके लिए वे हर तरह की जांच का सामना करने को तैयार हैं। एसआईटी गठन के लिए ज्ञापन पर वह विधायकों के दस्तखत ले रही हैं। सभी विधायकों का समर्थन हासिल कर वह राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर एसआईटी से जांच की मांग करेंगी। भोपाल में मौजूद रामबाई के पति गोविंद सिंह का भी आरोप है कि क्षेत्र के भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने उसके खिलाफ साजिश कर आरोपितों में उनका नाम भी जुड़वा दिया, जबकि वह हत्यारों में शामिल नहीं हैं।

मंत्री बनने की नहीं सोचते: रामबाई

बसपा विधायक से जब पूछा गया कि आपको मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने का मामला कहां तक पहुंचा? इस पर उनका जवाब था कि 'हमारा अब मंत्री बनने पर जोर नहीं है", हम लोग पहले से ही इस मामले में इतने उलझ गए हैं कि इस बारे में चर्चा ही नहीं करते। उल्लेखनीय है कि इसके पहले रामबाई स्वयं को मंत्री बनाने संबंधी मांग कई बार मीडिया के जरिए उठा चुकी हैं।

बसपा बाहर से देगी समर्थन: पिप्पल

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रमाकांत पिप्पल का कहना है कि रामबाई कुछ भी कहें, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती का निर्णय स्पष्ट है कि पार्टी सरकार में शामिल नहीं होगी। मप्र की कमलनाथ सरकार को बसपा बाहर से ही अपना समर्थन देगी, इस पर पार्टी अब भी कायम है। बसपा अध्यक्ष ने यह भी बताया कि रामबाई के पति पर दर्ज प्रकरण के संदर्भ में संगठन प्रमुख के नाते उन्होंने भी पूछताछ की है, जिसमें विधायक ने यही बताया कि उनके खिलाफ साजिश की गई है।

चंबल से पानी का वादा क्यों पूरा नहीं हुआ?
चंबल से पानी उपलब्ध कराना मेरी प्राथमिकता थी और रहेगी। मैंने अपने...




चंबल से पानी का वादा क्यों पूरा नहीं हुआ? 

चंबल से पानी उपलब्ध कराना मेरी प्राथमिकता थी और रहेगी। मैंने अपने पिछले कार्यकाल में ही 267 करोड़ रुपए की केंद्र से स्वीकृति दिला दी थी। अब स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की क्लियरेंस चाहिए। इसके लिए मैंने सीएम से बात की है, क्योंकि वे इसके अध्यक्ष हैं। स्टेट के बाद सेंट्रल वाइल्ड लाइफ से मैं इसे स्वीकृत करा दूंगा। फिर टेंडर प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। 

कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन ये वादा तो आप पूरा नहीं कर पाए ? 

देखिए, मैंने कभी झूठा वादा या घोषणा नहीं की है। विगत 30 साल से चंबल का पानी ग्वालियर लाने की बातें हो रही थीं। ये इतना आसान होता, तो पहले क्यों नहीं हुआ? मैंने दिन रात एक करके इसकी डीपीआर तैयार कराई, केंद्र से 267 करोड़ रुपए स्वीकृत कराए। उसके बाद आवश्यक एनओसी लीं, दो एनओसी रह गई हैं, वह भी मैं करा दूंगा। । 

पर अब तो आप मुरैना से सांसद हैं? 

तो क्या हुआ ? मैं विवेक जी के कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करूंगा। मुरैना में चंबल से पानी लाने का प्रोजेक्ट भी मैं स्वीकृत करा चुका हूं। ग्वालियर में कोई कितने भी अड़ंगे लगाए, लेकिन दो साल में चंबल का पानी मिलने लगेगा। इससे यहां अगले 50 साल तक पेयजल की किल्लत नहीं रहेगी। 

आपने ग्वालियर में काम नहीं किया, क्या इसलिए क्षेत्र बदलना पड़ा? 

किसे कहां से लड़ना है, ये फैसला तो पार्टी हाईकमान करती है। रही बात काम की, तो ग्वालियर मेरी जन्मभूमि है। मैंने पांच साल में 10 हजार करोड़ रुपए के काम कराए हैं। चंबल से पानी योजना की स्वीकृति, पड़ाव आरओबी, विवेकानंद नीडम, शताब्दीपुरम व मल्लगढ़ा तथा रेसकोर्स रोड से तानसेन रोड तक फ्लाईओवर, 1000 बिस्तर व सुपर स्पेशलिटीज हाॅस्पिटल, कार्डियक सेंटर, आईटी पार्क, कालीन पार्क, टैक्सटाइल पार्क, बैजाताल का सौंदर्यीकरण के साथ ही कई महत्वपूर्ण सड़कों सहित सैकड़ों बड़े प्रोजेक्ट स्वीकृत कराए। मैं श्रेय की राजनीति नहीं करता हूं। खामोशी से काम करता रहता हूं। क्षेत्र के लोग सब जानते हैं और उनका मुझे भरपूर प्यार व आशीर्वाद मिल रहा है। 

दो साल पहले ग्वालियर का प्रतिनिधित्व कर रहे केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने वादा किया था कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले वे ग्वालियर की पेजयल समस्या के स्थाई समाधान के लिए चंबल से पानी लाने के प्रोजेक्ट का बजट व टेंडर स्वीकृत करा देंगे। अब उन्होंने मुरैना से लोकसभा चुनाव लड़ा तो ग्वालियर के वादे का क्या ? आखिर उन्होंने वादा क्यों पूरा नहीं किया? प्यासे शहर के सबसे बड़े मुद्दे पर केंद्र में मध्यप्रदेश के सबसे कद्दावर मंत्री श्री तोमर ने दैनिक भास्कर डीबी स्टार से खुलकर दिल की बात की। 

शहर के लिए 

अब सिर्फ दो एनओसी दूर है ग्वालियर से चंबल का पानी: नरेंद्र सिंह तोमर 

देश के लिए 

केंद्र में दूसरी बार पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय संभाल रहे नरेंद्र सिंह तोमर ने कार्यभार संभालने के बाद 2022 तक ग्रामीण क्षेत्र में 1.95 करोड़ नए आवास का लक्ष्य रखा है। ग्रामीण क्षेत्र में आवासहीनों को आवास की योजना ने भाजपा को पुन: सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। साथ ही श्री तोमर भी मंत्रिमंडल में 15वें स्थान से सातवें स्थान पर आ गए हैं। ग्रामीणों का जीवन स्तर और ऊपर उठाने तथा उनकी आय दोगुना करने के लिए इस बार उन्होंने ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान (जीपीडीपी) को उच्च प्राथमिकता पर लिया है। 2.50 लाख ग्राम पंचायतों की जीपीडीपी के लिए 2.292 लाख करोड़ रुपए पूरी पारदर्शिता से उपलब्ध कराएंगे। 

लाख गांवों के जीपीडीपी पर 2.292 लाख करोड़ का खर्च 

आपको पुन: पंचायत ग्रामीण विकास मंत्रालय मिला है, अब क्या लक्ष्य है? 

2022 तक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 1.95 करोड़ परिवारों को घर उपलब्ध कराएंगे। इसके लिए हमने 2.48 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। हम तेजी से इस पर काम कर रहे हैं। 2024-25 तक 1.25 लाख किमी प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क बनाएंगे। इस पर 80 हजार करोड़ रुपए खर्च करेंगे। 

कृषि मंत्रालय की कमान पहली बार आपके हाथों में हैं, किसानों को लिए क्या करेंगे? 

2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करना लक्ष्य है। कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विस्तृत तैयारी की है। निर्यात व अनुसंधान पर बल दिया जा रहा है। जैविक व जीरो बजट खेती पर तेजी से काम शुरू किया गया है। परिणाम एक साल में सामने आने लगेंगे। इसके अलावा प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का लाभ 10 करोड़ किसानों को मिले, यह लक्ष्य रखा गया है। पेंशन योजना में किसान को 3000 रुपए हर माह मिलेंगे। पांच करोड़ किसानों को इसमें जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। 



डॉ शर्मा ने सरकार से जानना चाहा कि प्रथम श्रेणी के अधिकारियों के प्रमोशन में आरक्षण है या नहीं


मंथन न्यूज
भोपाल। रविवार को विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के प्रतिनिधियों को मुख्यमंत्री के साथ चर्चा करने के निर्देश दिए। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ सीतासरन शर्मा ने सदन में प्रश्नकाल में यह मामला उठाया, जिस पर काफी देर तक पूरक सवाल हुए। अध्यक्ष प्रजापति ने कहा कि नियम सभी श्रेणियों के लिए एकसमान होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रथम श्रेणी के अधिकारी लगातार प्रमोशन पा रहे हैं। उन्हें इस मुद्दे पर कोई चिंता नहीं है, जबकि उन्हें ही इसकी चिंता करना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने निर्देश दिए कि पक्ष और विपक्ष के प्रतिनिधि किसी दिन इस विषय पर मुख्यमंत्री के साथ चर्चा करें।

इसके पहले सामान्य प्रशासन मंत्री डॉ गोविंद सिंह ने कहा कि अधिकारियों ने उच्चतम न्यायालय का आदेश सब पर लागू होना बताया है। सभी विभाग इससे परेशान हैं। प्रदेश में पद खाली हैं और काम रुके हुए हैं। इसलिए उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से इस बारे में राय लें।

डॉ शर्मा ने सरकार से जानना चाहा कि प्रथम श्रेणी के अधिकारियों के प्रमोशन में आरक्षण है या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश में 'स्टेटस क्यो' की व्याख्या क्या है। विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने सुझाव दिया कि इस बारे में विधि विशेषज्ञों से राय ले ली जाए। उन्होंने कहा कि संभवत: इसकी व्याख्या गलत हुयी है। भाजपा के ही डॉ नरोत्तम मिश्रा ने अध्यक्ष से आग्रह किया कि इस पर कोई व्यवस्था आ जाए। इसके बाद अध्यक्ष ने अपनी व्यवस्था दी।

जानकारी संबंधित विभागों तक पहुंचायी जाए: विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने आज सदन में कहा कि शून्यकाल के दौरान सदस्यों की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों की जानकारी संबंधित विभागों तक पहुंचायी जाए। प्रजापति ने यह निर्देश अपने अधिकारियों को देते हुए कहा कि इनका उत्तर मिलना भी सुनिश्चित किया जाए।

शून्यकाल में भाजपा के रामेश्वर शर्मा द्वारा शहर में रेत के भंडारण संबंधी मामला उठाने पर अध्यक्ष ने कहा कि रेत के शहर में भंडारण की व्यवस्था बंद की जाए। उन्होंने कहा कि भोपाल में रात में ट्रक खड़े होने की व्यवस्था भी बंद की जाए। अध्यक्ष ने कहा कि भोपाल से सटे मिसरोद क्षेत्र की आसपास की बहुत सी कालोनियों के रहवासी इस समस्या से परेशान हैं। वहां पर रेत के डंपरों से अवैध भंडारण किया जाता है। रेत माफिया ट्रकों से जाम लगा देते हैं। मंत्री आरिफ अकील ने इस मामले में अध्यक्ष से व्यवस्था देने का अनुरोध किया था।

बसपा ने कुमारस्वामी सरकार को समर्थन दिया था। -फाइल



मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के विश्वास मत प्रस्ताव पर गुरुवार और शुक्रवार को विधानसभा में बहस हुई


राज्यपाल ने 2 डेडलाइन देकर शुक्रवार को कुमारस्वामी से बहुमत साबित करने के लिए कहा था


कुमारस्वामी ने राज्यपाल के खिलाफ फ्लोर टेस्ट के लिए डेडलाइन देने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी


बागी विधायकों ने कहा- हम सिर्फ गठबंधन सरकार को सबक सिखाने के लिए मुंबई आए हैं


Dainik Bhaskar

Jul 21, 2019, 05:27 PM IST

बेंगलुरु.कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार सोमवार को बहुमत साबित करेगी। राज्य के बसपा के इकलौते विधायक एन महेश फ्लोर टेस्ट में शामिल नहीं होंगे। रविवार को महेश ने कहा कि पार्टी सुप्रीमो मायावती ने उन्हें इसके लिए निर्देश दिया है। विश्वास मत प्रस्ताव पर बहस के दौरान भी बसपा विधायक सदन में गैर हाजिर थे। इसके बाद कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया था कि मायावती ने अपने विधायक को गठबंधन सरकार के साथ जाने के लिए कहा था। कुमारस्वामी के विश्वास मत प्रस्ताव पर गुरुवार और शुक्रवार को चर्चा हो चुकी है।

रविवार को मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कांग्रेस-जेडीएस विधायकों के साथ ताज होटल में बैठक की। भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने फिर से कहा कि सोमवार को गठबंधन सरकार का आखिरी दिन होगा। उधर, मुंबई में मौजूद बागी विधायकों ने कहा, ''हम यहां सिर्फ गठबंधन (कांग्रेस-जेडीएस) सरकार को सबक सिखाने के लिए आए हैं। इसके अलावा कोई दूसरा मकसद नहीं है। हम यहां पैसे या किसी दूसरी चीज के लालच में नहीं आए। एक बार सबकुछ ठीक हो जाए, बेंगलुरु लौट जाएंगे।''

कुमारस्वामी ने राज्यपाल की दो डेडलाइन नजरअंदाज कीं
राज्यपाल वजुभाई वाला ने कुमारस्वामी को बहुमत साबित करने के लिए शुक्रवार दोपहर 1.30 बजे और फिर शाम 6 बजे तक की डेडलाइन दी थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने इस दिन विश्वास मत साबित नहीं किया। कुमारस्वामी ने शुक्रवार को कहा था, ''मेरे मन में राज्यपाल के लिए सम्मान है, लेकिन उनके दूसरे प्रेम पत्र ने मुझे आहत किया। मैं फ्लोर टेस्ट का फैसला स्पीकर पर छोड़ता हूं। मैं दिल्ली द्वारा निर्देशित नहीं हो सकता। मैं स्पीकर से अपील करता हूं कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए पत्र से मेरी रक्षा करें।''

गठबंधन सरकार गिराने का माहौल बनाया जा रहा: कुमारस्वामी
मुख्यमंत्री ने येदियुरप्पा के निजी सचिव पीए संतोष के साथ निर्दलीय विधायक एच नागेश की फोटो दिखाते हुए कहा था, ''क्या वाकई उन्हें विधायकों की खरीद-फरोख्त के बारे में 10 दिन पहले ही पता चला? जब से कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनी, इसे गिराने के लिए माहौल बनाया जा रहा है। मुझे पहले दिन से पता था कि सत्ता ज्यादा नहीं चलेगी, देखता हूं भाजपा कितने दिन सरकार चला पाएगी? मुद्दे पर बहस होने दीजिए। आप (भाजपा) अभी भी सरकार बना सकते हैं। कोई जल्दी नहीं है। आप सोमवार या मंगलवार को भी सरकार बना सकते हैं। मैं अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा। पहले राजनीतिक संकट पर चर्चा होगी, इसके बाद फ्लोर टेस्ट।''

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कांग्रेस ने दायर की याचिका
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, इसमें शीर्ष अदालत के 17 जुलाई के फैसले को चुनौती दी गई। दरअसल, कोर्ट ने 17 जुलाई को कहा था कि 15 बागी विधायकों को सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनने के लिए बाध्य ना किया जाए। इन विधायकों पर व्हिप लागू नहीं होगी। कांग्रेस कर्नाटक चीफ दिनेश गुंडू राव ने याचिका दायर कर कोर्ट से फैसले पर स्पष्टीकरण की मांग की। इसमें कहा गया है कि कोर्ट का आदेश व्हिप जारी करने के पार्टी के अधिकार को प्रभावित करता है।

जेडीएस ने विधायकों के लिए व्हिप जारी किया था
मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने जेडीएस के सभी 37 विधायकों को सदन में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया था। इनमें उनकी पार्टी के तीन बागी विधायक नारायण गौड़ा, गोपालैया और एच विश्वनाथ भी शामिल हैं। जेडीएस ने कहा है कि अगर विधायक गैर-मौजूद रहते हैं या विश्वास मत के खिलाफ वोटिंग करते हैं तो दल बदल कानून के तहत उन्हें अयोग्य ठहराने की कार्रवाई की जाएगी। जबकि, इस्तीफा देने वाले कांग्रेस विधायक रामलिंगा रेड्डी ने कहा कि वह पार्टी में हैं और सरकार के पक्ष में वोटिंग करेंगे।

कांग्रेस के 13 और जेडीएस के 3 विधायकों ने दिया इस्तीफा
उमेश कामतल्ली, बीसी पाटिल, रमेश जारकिहोली, शिवाराम हेब्बर, एच विश्वनाथ, गोपालैया, बी बस्वराज, नारायण गौड़ा, मुनिरत्ना, एसटी सोमाशेखरा, प्रताप गौड़ा पाटिल, मुनिरत्ना और आनंद सिंह इस्तीफा सौंप चुके हैं। वहीं, कांग्रेस के निलंबित विधायक रोशन बेग ने भी इस्तीफा दे दिया। 10 जून को के सुधाकर, एमटीबी नागराज ने इस्तीफा दे दिया था।



प्रदेश में कांग्रेस की सरकार एक्सीडेंटल तरीके से बनी है, यह कभी भी हादसे का शिकार हो सकती है: प्रहलाद पटेलमध्यप्रदेश में कमलनाथ की कांग्रेस सरकार एक्सीडेंटल तरीके से बनी है। यह दुर्घटना से बनी सरकार है, कभी भी हादसे का...

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मध्यप्रदेश में कमलनाथ की कांग्रेस सरकार एक्सीडेंटल तरीके से बनी है। यह दुर्घटना से बनी सरकार है, कभी भी हादसे का शिकार हो सकती है। कांग्रेसी कभी भी आपा खो देते, किसी बारे में कुछ भी बोल देते हैं, अब कांग्रेस के नेता भटकाव बढ़ाने के लिए अनर्गल बातें कर रहे हैं। इसी वजह से पूरे राज्य में अराजकता का महौल है। 

यह बात केंद्रीय पयर्टन राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल ने दमोह प्रवास के दौरान अपने निवास पर पत्रकारों से चर्चा में कही। उन्हाेने कहा कि कांग्रेसी लोगों में भटकाव का माहौल पैदा करने के गलत तरह का माहौल पैदा कर रहे हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी होने वाला नहीं है। केंद्रीय बजट में मप्र को मिलने वाली रकम 2677 करोड़ रुपए की राशि की कटौती के प्रश्न पर श्री पटेल ने कहा कि प्रदेश में वित्तीय प्रबंधन की कमी है। इसलिए समस्याएं आ रही हैं। कांग्रेसियों को अपने निजी स्वार्थ सिद्ध करने हैं और अपने लोगों को फायदा पहुंचाना है। इसलिए ऐसा काम कर रही है। इस बीच पटेल ने चर्चा में मध्यप्रदेश मे चल रहे तबादला उद्योग की निंदा की। दरअसल मध्यप्रदेश के बजट में कटौती होने के बाद प्रदेश के बीजेपी के 28 सांसदों ने लोकसभा में मेज थपथपा कर स्वागत किया है। इसका पूरे प्रदेश में कांग्रेस विरोध कर रही है। 

देशभर में NRC लागू करने की तैयारी, यह है केंद्र सरकार की पूरी प्लानिंग


सभी राज्यों के जिलाधिकारियों को ट्रिब्यूनल गठित करने का अधिकार दिया गया है जो भारत में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों की पहचान करेगा।

देशभर में एनआरसी लागू करने पर काम कर रहा केंद्रीय गृह मंत्रालय --------- राष्ट्रीय पेज पर --------- - जिलाधिकारियों को मिल जाएगा ट्रिब्यूनल गठन का अधिकार ----------------

नई दिल्ली। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC की शुरुआत असम से हुई है। इस बीच खबर है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय पूरे देश में NRC लागू करने पर विचार कर रहा है। मकसद यही है कि देशभर में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों की पहचान करके उन्हें उनके देशों में भेजा जाए। NRC का दायरा बढ़ाने की कोशिश के साथ ही इस दिशा में कदम उठाया जा चुका है। 30 मई को केंद्र सरकार की ओर फॉरेनर्स (ट्रिब्यूनल्स) ऑर्डर्स, 1964 में संशोधन आदेश जारी किया जा चुका है। यह आदेश NRC का दायरा बढ़ाने से संबंधित है।

त्रिपुरा और मिजोरम में उठ रही NRC की मांग

त्रिपुरा में सभी दलों ने किया NRC का समर्थन पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में लगभग सभी दलों ने असम की तर्ज पर राज्य में NRC लागू करने का समर्थन किया है। इन दलों में सत्तारूढ़ भाजपा के अलावा कांग्रेस, माकपा और नेशनल पीपुल्स पार्टी शामिल हैं। इसके अलावा इंडीजिनस नेशनल पार्टी ऑफ त्रिपुरा ने पहले ही इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की हुई है।

मिजोरम में भी NRC की मांग कांग्रेस को छोड़कर मिजोरम में सभी स्थानीय पार्टियां राज्य में NRC लागू करने की मांग कर रही हैं। पूर्वोत्तर के इस ईसाई बहुल राज्य की सीमाएं बांग्लादेश और म्यांमार से लगती हैं। सत्तारूढ़ मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) ने पिछले साल नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान अपने घोषणापत्र में NRC लागू करने का वादा किया था। बता दें कि MNF भाजपा द्वारा गठित गैर-कांग्रेसी पार्टियों के नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस का एक घटक है। राजनीतिक दलों के अलावा मिजोरम के गैरसरकारी संगठन भी राज्य में NRC लागू करने की मांग कर रहे हैं।

इस बीच, असम से खबर है कि यहां तैयार किए जा रहे NRC का सरकार वरिष्ठ अधिकारियों से फिर सत्यापन कराएगी। निचले स्तर के अधिकारियों में भ्रष्टाचार के चलते सरकार को आशंका है कि अवैध रूप से रह रहे कुछ विदेशियों के नाम भी NRC में शामिल हो गए हैं। लिहाजा सरकार इस आशंका को दूर कर लेना चाहती है।

राजनीतिक उठापटक में कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश सरकार के लिए संकट हो सकता है। इन दोनों राज्यों में भाजपा पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में बेहद मामूली अंतर से सरकार बनाने से चूक गई थी। कर्नाटक का फैसला अगले सप्ताह हो जाएगा। मध्य प्रदेश में अभी फिलहाल शांति है, लेकिन राज्यपाल लालजी टंडन के बिहार से मध्य प्रदेश भेजे जाने से इस तरह की अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। 


कर्नाटक में राज्यपाल व विधानसभा स्पीकर के बीच जारी रस्साकशी का फैसला अगले सप्ताह की शुरुआत में हो सकता है। हालांकि इस बात की भी आशंका है कि स्पीकर का कोई फैसला ऐसा भी हो सकता है जिससे मामला सदन से अदालत भी पहुंच सकता है। इसे देखते हुए भाजपा नेतृत्व बेहद संयम व संभलकर कदम रख रही है। उसके सामने केंद्र से हस्तक्षेप का भी विकल्प है, लेकिन उसका इस्तेमाल कर वह कांग्रेस-जेडीएस को राजनीतिक शहीद नहीं होने देना चाहती है।

मध्य प्रदेश में सत्ता से चूक जाने का मलाल : 
सूत्रों के अनुसार, मध्य प्रदेश में भाजपा को बेहद कम अंतर से सत्ता से चूक जाने का मलाल तो हैं, लेकिन वह राजनीतिक ऑपरेशन में जल्दबाजी नहीं करेगी। वहां, कांग्रेस में बड़े नेताओं के बीच अंदरूनी टकराव चल रहा है। भाजपा इसी का लाभ लेने की कोशिश कर सकती है। इस साल के आखिर में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद ऐसी स्थितियां बन सकती है। राज्य में भाजपा बहुमत से महज पांच विधायक दूर है। ऐसे में उसे कर्नाटक की तरह कोई बड़ा आपरेशन नहीं करना है।  

नए नेतृत्व पर विचार कर सकती है भाजपा : 
मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने एक समस्या नेतृत्व की है। राज्य में तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज सिंह चौहान की जगह भाजपा नया नेतृत्व उभारना चाहती है। इसके अलावा उसका ध्यान राज्य सामाजिक व क्षेत्रीय संतुलन पर भी है। बदलाव होने की स्थिति में भाजपा राज्य में किसी नए नेता पर दांव लगाने की कोशिश करेगी। इसके लिए विधायकों से लेकर सांसदों के भी नामों की चर्चा है। मध्य प्रदेश में बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन को भेजे जाने से भी इस तरह की अटकलें है। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक उठापटक के माहौल में अनुभवी नेता रहे लालजी टंडन मध्य प्रदेश में किसी भी तरह के राजनीतिक संकट में बेहतर ढंग से निपट सकते हैं। 
 

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