कमलनाथ ने प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफे की पेशकश की है

भोपाल. लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस कार्य समिति की बैठक दिल्ली में चल रही है। इस बैठक में कार्य समिति के सारे सदस्यों के साथ सभी राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद हैं। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ इस बैठक में नहीं गए हैं।


 

इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार में होने बावजूद भी इस बार सिर्फ एक सीट जीती है। छिंदवाड़ा सीट से कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ चुनाव जीते हैं। बैठक में राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के भूपेल बघेल और पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह गए हैं। लेकिन कमलनाथ कहीं नहीं दिख रहे हैं।

 

मध्यप्रदेश के कांग्रेस महासचिव और पश्चिम उत्तर प्रदेश के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया वहां मौजूद हैं। सिंधिया भी इस बार गुना से चुनाव हार गए हैं। वहीं, सोमवार को कमलनाथ ने कैबिनेट की बैठक बुलाई है। इसके साथ ही वह जल्द ही मंत्रिमंडल का भी विस्तार कर सकते हैं।

 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले दो दिनों से सीएम कमलनाथ भोपाल में घर पर ही हैं। उन्होंने शुक्रवार को दिग्विजय सिंह से मुलाकात की थी। हार की समीक्षा के लिए कमलनाथ ने विधायकों की बैठक बुलाई है। जिस में वे हार के कारणों की समीक्षा करेंगे।

 

वहीं, कमलनाथ ने प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया के सामने इस्तीफे की पेशकश की है। बताया जा रहा है कि दीपक बाबरिया इस मामले में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ विचार -विमर्श करेंगे। दीपक बाबरिया ने कमलनाथ को राहुल गांधी से विचार-विमर्श करने की सलाह दी है।

 

कमलनाथ विधानसभा चुनाव के बाद ही कमलनाथ अध्यक्ष पद छोड़ना चाहते थे। कमलनाथ ने कहा- विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी प्रदेश अध्यक्ष छोड़ने के लिए राहुल गांधी से आग्रह किया था लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। कमलनाथ ने कहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अध्यक्ष पद के साथ न्याय नहीं हो पाएगा ऐसे में पार्टी को नए प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत है। जिससे की रसकार और संगठन सुचारू रबप से काम कर सकें।



भोपाल। लोकसभा चुनावनतीजों ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को भीतर तक हिला दिया है। नरेन्द्र मोदी की सुनामी ने छह माह पहले सत्ता में आई कांग्रेस को ऐसा झटका दिया है कि उससे उबरने में उसे लंबा वक्त लग सकता है। पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गज इस सुनामी के आगे टिक नहीं पाए।

इन नतीजों ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को भी चिंंता में डाल दिया है। चिंता सरकार के अस्तित्व को लेकर है। कांग्रेस सरकार के गठन के साथ उसके भविष्य को लेकर बयानबाजी करने वाले भाजपा नेताओं के हौंसले सूबे की 29 में से 28 सीट जीतने के बाद और भी ज्यादा बुलंद हो गए हैं। कांग्रेस विधायकों को एकजुट रखने की गरज से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 26 मई को भोपाल में विधायकों की बैठक भी बुलाई है।

नवंबर 2018 में हुए मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिल पाया था। 230 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 114 जबकि भाजपा को 109 सीटें मिल पायी थी। बहुमत के लिए आवश्यक 116 के आंकड़े को दोनों ही दल नहीं छू पाए थे। तब चार निर्दलीय, दो बसपा और एक सपा विधायकों ने कांग्रेस को समर्थन देने की चिठ्ठी सौंपकर उसकी सरकार बनाने की राह आसान कर दी। कमलनाथ ने चार निर्दलीय विधायकों में से एक को मंत्री बनाया।

बाकी के विधायक मंत्री बनने के भरोसे बैठे हैं। बचे हुए तीन निर्दलीय में से एक ने अपनी पत्नी को लोकसभा चुनाव लड़ाने का एलान किया तो नाथ ने उसे बुलाकर समझाया और वचन दिया कि लोकसभा चुनाव निपटते ही उसे मंत्री बना दिया जाएगा। सपा और बसपा के लखनऊ में बैठे नेता भी इस मुद्दे पर प्रदेश की कांग्रेस सरकार से नाराज चल रहे हैं। राजनीतिक इस समय जो विधायक आंखें तरेर लेगा उसे मंत्री पद मिल पाएगा।

कांग्रेस को भय यह है कि भाजपा एक दो माह में उसका गेम बिगाड़ सकती हैं। इस भय की बानगी शुक्रवार को उस समय देखने को मिली जब नीमच के एक कांग्रेस विधायक हरदीप सिंह डंग के इस्तीफे की खबर सोशल मीडिया पर वायरल होते ही प्रदेश कांग्रेस एक्टिव हुई और तत्काल उससे संपर्क स्थापित कर खंडन भी वायरल किया गया कि डंग ने इस्तीफा नहीं दिया।

डंग इकलौते सिख विधायक है, इस नाते मंत्री बनने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। चूंकि वे नाराज हैं इसलिए जैसे ही उनके इस्तीफे की खबर वायरल हुई कांग्रेस का डैमेज कंट्रोल दस्ता सक्रिय हो गया।

लोकसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी हर सभा में लोगों से यह अपील की थी कि वे एक वोट देकर दो सरकार बनाएं। दूसरी सरकार से उनका आशय मप्र में सरकार बनाने को लेकर था। जाहिर है कि सरकार तभी बनेगी जब मौजूदा सरकार गिरेगी। मौजूदा सरकार तब तक नहीं गिर सकती जब तक कि समर्थन देने वाले दलों के तीन विधायकों के अलावा निर्दलीय और कुछ कांग्रेस विधायक नहीं टूटते है।

हालांकि सब कुछ इतना आसान नहीं है। पर भाजपा के तमाम नेता आए दिन सरकार गिराने की बातें जरूर कर रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने मतदान वाले दिन कहा था कि कमलनाथ सरकार ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है।

मप्र विधानसभा में नेता विपक्ष गोपाल भार्गव ने तो राज्यपाल को पत्र लिखकर सरकार के फ्लोर टेस्ट की मांग कर डाली थी। तब खुद मुख्यमंत्री नाथ को सामने आकर यह कहना पड़ा कि वे अब तक चार बार बहुमत साबित कर चुके हैं। एक बार और बहुमत साबित करने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी।

राज्य भाजपा के अध्यक्ष राकेश सिंह का कहना है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखते हुए नैतिकता के आधार पर कमलनाथ को खुद इस्तीफा दे देना चाहिए।

जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के मीडिया समन्वयक नरेन्द्र सलूजा कहते हैं कि बात कर भाजपा राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पैदा कर रही है। कांग्रेस सरकार को किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। सारे निर्दलीय, समर्थक दल के विधायक और कांग्रेस विधायक एकजुट है।

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*शिवपुरी ब्यूरो।* शिवपुरी जिले के वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रदेश की पत्रकारिता में भी अपना नाम रोशन करने वाले स्व.श्री जयकिशन शर्मा की 9 वीं पुण्यतिथि पर उनके नाम से पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन 26 मई रविवार को शहर के सनराईज होटल कोतवाली रोड़ पर सुबह 11 बजे आयोजित किया जाएगा। स्व. शर्मा की पत्रकारिता एक जुझारूपन एवं कुशल लेखनी के लिए जानी जाती थी। वरिष्ठ पत्रकार स्व. शर्मा का 26 मई 2010 को लम्बी बीमारी के कारण अल्प आयु में निधन हो गया था। उनके पत्रकारिता जीवन की यादों को नियमित रूप से संजोये रखने के लिए उनके पुत्र लालू शर्मा एवं पत्रकारों द्वारा प्रत्येक वर्ष उनकी पुण्य तिथि पर पत्रकारिता के साथ सामाजिक एवं कई अनेक आयोजन किए जाते हैं। इस वर्ष से उनके नाम से पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा हैं। उसमें  जनप्रतिनिधि, राजनेता, पत्रकारों के साथ अनेक गणमान्य नागरिक शामिल होगे। पत्रकारों की एक चयन समिति ने निर्णय लिया हैं कि शहर में उत्कृष्ट लेखनी से अपनी अलग पहचान बनाने बाले कई पत्रकारों का स्व. जकिशन शर्मा पत्रकार सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। उक्त कार्यक्रम की जानकारी राजकुमार शर्मा पत्रकार ने दी हैं।

शिवपुरी की  साक्षी सहगल ने दिल्ली में बीते रोज आयोजित मिस कैपिटल ऑफ इंडिया 2019 प्रतियोगिता में जगह बनाकर जिले का नाम रोशन कर दिया है। दिव्या जैन और करण द्वारा फेशन मेराकी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमे देश भर के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
इसी प्रतियोगिता में शिवपुरी निवासी और जाने माने टेंट व्यवसाई विक्की सहगल % विनीशा सहगल की सुपुत्री साक्षी ने प्रतियोगिता के फाइनल जगह बनाई। साक्षी का चयन होने पर शिवपुरी शहर  के अनेक लोगों ने साक्षी के उज्वल भविष्य की कामना की है।


मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने मंत्रिमंडल का नए सिरे से गठन कर सकते हैं।

भोपाल (मंथन न्यूज)। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार अब निर्दलीय विधायकों को साधने की कोशिश में मंत्रिमंडल विस्तार कर सकती है। कांग्रेस के जिम्मेदार पदाधिकारी बताते हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार संभवत: विधानसभा के बजट सत्र के पहले जून में होने की संभावना है।

वहीं, पार्टी के कुछ असंतुष्ट विधायकों को हाईकमान ने लोकसभा चुनाव में संतुष्ट भी किया है, लेकिन अभी भी ऐसे कुछ विधायक मंत्री पद की बाट जोह रहे हैं। इधर, चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने मंत्रिमंडल का नए सिरे से गठन कर सकते हैं। इसके लिए लोकसभा चुनाव परिणामों में मंत्रियों के क्षेत्र में पार्टी के प्रदर्शन को मापदंड बनाए जाने पर भी विचार किया जा रहा है।

प्रदेश की कमलनाथ सरकार को बहुजन समाज पार्टी के दो और समाजवादी पार्टी के एक, कुल तीन और चार निर्दलीय विधायकों ने समर्थन दिया है। चार निर्दलीय विधायकों में से प्रदीप जायसवाल को मंत्री बना दिए जाने से सरकार 118 विधायकों की संख्या के साथ बहुमत में है। सूत्र बताते हैं कि लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद कमलनाथ अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर दो और निर्दलीयों को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते हंै। इनमें बुरहानपुर के ठाकुर सुरेंद्र सिंह शेरा भैया और सुसनेर के विक्रम सिंह राणा के नाम हैं।

गौरतलब है कि सुरेंद्र सिंह को लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी अरुण यादव के खिलाफ पत्नी के निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़ा करने पर मनाया गया था। नाम वापसी के दिन सुरेंद्र सिंह की पत्नी ने नामांकन पर्चा वापस लिया था। सूत्रों का कहना है कि उस समय सुरेंद्र सिंह को मंत्री बनाए जाने का ऑफर दिया गया था। दूसरी तरफ सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विक्रम सिंह राणा मंत्री नहीं बनाए जाने के कारण मंत्रिमंडल के गठन के पहले दिन से ही नाराज हैं। उन्हें भी कमलनाथ संतुष्ट करने के लिए मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते हैं। तीसरे निर्दलीय केदार डाबर ही बचेंगे। कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों में राजनगर विधायक विक्रम सिंह नातीराजा और बदनावर विधायक राजवर्धन सिंह दत्तीगांव को पार्टी ने लोकसभा चुनाव में उनके मुताबिक टिकट देकर संतुष्ट किया है। नातीराजा की पत्नी कविता सिंह को खजुराहो से तो राजवर्धन सिंह समर्थक दिनेश गिरवाल को धार से टिकट दिया गया है। अब असंतुष्ट विधायकों में अनुपपुर के बिसाहूलाल सिंह और पिछोर के केपी सिंह ही बचे हैं।

बसपा-सपा विधायकों पर असमंजस
वहीं, कमलनाथ सरकार को बनाने में विस परिणामों की घोषणा के बाद सबसे पहले लिखित में समर्थन देने वाली बसपा और सपा को लेकर फिलहाल असमंजस की स्थिति है। लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद इस बारे में तस्वीर साफ होगी। उत्तरप्रदेश में महागठबंधन के दौरान कांग्रेस से बसपा-सपा ने जो दूरी बनाई थी, उससे अभी रिश्ते सामान्य नजर नहीं आ रहे हैं। 23 मई को लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद इनकी स्थिति स्पष्ट होगी। मगर, प्रदेश सपा विधायक राजेश शुक्ला कांग्रेस पृष्ठभूमि से हैं तो सपा से कांग्रेस को विशेष परेशानी नहीं आएगी। बसपा की विधायक रामबाई की पहले दिन से ही कमलनाथ सरकार से अनबन चलती रही है। मंत्री बनाए जाने के लिए वे लगातार अड़ी हुई हैं, लेकिन कुछ महीने से उनकी आवाज दब गई है। उनके पति एक आपराधिक मामले में फंस गए हैं, जिससे रामबाई शांत बैठ गई हैं। बसपा के दूसरे विधायक संजीव कुशवाह मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी बताए जाते हैं और कुछ एक मर्तबा रामबाई को उन्होंने मध्यस्थता कर शांत किया था।
अभी 6 मंत्री पद रिक्त
प्रदेश मंत्रिमंडल में अभी मुख्यमंत्री सहित 29 सदस्य हैं। छह मंत्री पद रिक्त हैं। कमलनाथ सरकार का पहला मंत्रिमंडल विस्तार 28 कैबिनेट मंत्रियों को शामिल किए जाने के साथ हुआ था। अगर दो निर्दलीय और बसपा-सपा के तीनों विधायकों को मंत्री बना भी दिया जाता है, तब भी मंत्रिमंडल में एक पद रिक्त रहेगा।



   


संगठन के पास पहुंची शिकायतें

भोपाल. लोकसभा चुनाव में कांगे्रस और भाजपा के कुछ प्रत्याशियों की राह में अपनों ने ही कांटे बिछा दिए थे। उन्हें चुनाव में प्रतिद्वंद्वी के अलावा अपनों की पैदा की गई मुश्किलों से भी जूझना पड़ा। चुनाव के वक्त किसी पर भी कार्रवाई करना नई मुश्किल खड़ी कर सकता था। अब मतदान पूर्ण होते ही दोनों दल भितरघातियों और चुनाव में निष्क्रिय रहने वालों का रेकॉर्ड तैयार कर रहे हैं। चुनाव परिणाम के बाद कार्रवाई भी शुरू हो जाएगी।
भाजपा : दस सीटों से पहुंची शिकायत
भाजपा के कई प्रत्याशियों, चुनाव संयोजकों और जिला अध्यक्षों ने स्थानीय नेताओं-पदाधिकारियों के सहयोग नहीं करने की शिकायतें प्रदेश संगठन के पास भेजी हैं। पार्टी चुनाव परिणाम के बाद कुछ जिलों और मंडल के अध्यक्षों के साथ ही मोर्चा के भी कई पदाधिकारियों की छुट्टी करने जा रही है।
- इन सीटों से आई शिकायतें
सीधी- कई बूथों पर पार्टी के प्रतिनिधियों की तैनाती ही नहीं हो सकी। पूर्व सांसद और एक विधायक के खिलाफ भी असहयोग और निष्क्रिय रहने का फीडबैक।
खजुराहो- यहां बाहरी प्रत्याशी वीडी शर्मा को स्थानीय कार्यकर्ताओं का पूरा सहयोग नहीं मिला। कुछ लोगों ने बागी उतरे गिरीराज पोद्दार के समर्थन में काम किया है उनकी शिकायतें पहुंची है।
सागर- यहां राजबहादुर सिंह के टिकट से नाराज गई स्थानीय नेताओं के असहयोग और विरोध मेंं काम करने की शिकायत पहुंची है।
सतना- सतना में पूर्व विधायक सहित कुछ नेताओं के असहयोग की शिकायत है।
शहडोल- सांसद ज्ञान सिंह और उनके विधायक पुत्र शिवनारायण सिंह के निष्क्रिय रहने की शिकायत पहुंची है।
भोपाल- कई स्थानीय नेताओं के असहयोग की शिकायत की गई, जिसके चलते केंद्रीय संगठन को बड़े नेताओं की ड्यूटी लगाना पड़ी।
राजगढ़- स्थानीय स्तर पर नेताओं के असहयोग और चुनाव में कार्य नहीं करने की रिपोर्ट संगठन के पास पहुंची है।
बालाघाट- सांसद बोधङ्क्षसह भगत के बागी होकर चुनाव मैदान में उतरने के बाद उनके समर्थन में कई नेताओं-पदाधिकारियों के काम करने की शिकायत की गई।
इंदौर - यहां प्रत्याशी शंकर लालवानी का कई स्थानीय नेताओं ने असहयोग किया। हालात इतने बिगड़े की प्रदेश संगठन मंत्री रामलाल ने नेताओं की क्लास लगाई। इस बैठक में जिला अध्यक्ष गोपीकृष्ण को कड़ी फटकार भी मिली।
मंदसौर - यहां संगठन महामंत्री सुहास भगत और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को अंतिम वक्त पहुंचकर भाजपा नेताओं को सक्रिय करना पड़ा। यहां की कई शिकायतें पहुुचीं।
चुनाव लडऩे की इच्छा कई लोगों की होती है, लेकिन टिकट एक को ही मिलता है। ऐसे में असंतोष उपजना स्वाभाविक है। आवश्यकता पडऩे पर कार्रवाई भी की जाएगी।
- विजेश लुनावत, उपाध्यक्ष, प्रदेश भाजपा

कांग्रेस : असहयोगियों की कुंडली तैयार
कांग्रेस भी भितरघात की कुंडली तैयार कर रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ऐसे नेताओं की सूची तैयार करने के लिए कहा हैं। जिन सीटों से भितरघात की शिकायतें आई थीं, वहां संबंधित नेताओं को सरकार में कोई पद नहीं दिया जाएगा। साथ ही उन पर कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।
- चुनिंदा सीटों की स्थिति

भोपाल : दिग्विजय सिंह के चुनाव लडऩे के कारण अधिकतर गुट काम करने को मजबूर हो गए थे, लेकिन शिकायतों की भी भरमार रही है। दिग्विजय ने भी अपनी रिपोर्ट तैयार की है।
शहडोल : दल-बदल करके आईं प्रमिला सिंह को टिकट देने से स्थानीय नेता नाराज रहे थे। खुलकर विरोध नहीं किया गया, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं ने असहयोग किया।
खंडवा : निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने प्रत्याशी अरुण यादव को मुश्किल में डाल दिया। कुछ दिन पूर्व ही सीएम के मनाने पर शेरा माने थे, लेकिन उनकी भूमिका ठीक नहीं रही। यादव ने इस पर ऐतराज जताया है।
रतलाम : यहां कांतिलाल भूरिया की चुनौती बागी होने के बाद वापस पार्टी में आए जेवियर मेढ़ा के कारण बढ़ी है। मेढ़ा ने भूरिया खेमे को नुकसान पहुंचाया है।
सीधी : यहां पूर्व नेता-प्रतिपक्ष अजय सिंह को भीतरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। यहां पटेल खेमा उनसे पूरी तरह अलग-थलग रहा। मंत्री कमलेश्वर पटेल के पिता स्व. इंद्रजीत पटेल के समय से उनकी खेमेबाजी है।
खजुराहो : यहां कविता सिंह के टिकट से बाकी नेता नाराज थे। पूर्व राज्यसभा सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी व पूर्व मंत्री राजा पटैरिया का खेमा यहां अलग रहा। कविता के पति विधायक विक्रमय सिंह नातीराजा ही पूरा मोर्चा संभाले रहे।

चुनाव खत्म होने के बाद यह देखा ही जाता है कि किन नेताओं से सहयोग किया और किसने नहीं। इसकी पूरी जानकारी लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के सामने रखी जाएगी।
- चंद्रप्रभाष शेखर, संगठन प्रभारी, प्रदेश कांग्रेस

एग्जिट पोल के मुताबिक मध्य प्रदेश की कुल 29 में से बीजेपी को 26 से 28 और कांग्रेस को 1 से 3 सीटें मिलती हुई दिख रही है. अगर यही आंकड़े नतीजे में दब्दील होते हैं तो कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं. माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी कर्नाटक में सरकार बनाने की एक बार फिर से कोशिश कर सकती है.

कहीं खतरे में तो नहीं इन दो राज्यों की सरकारें? Exit Poll के बाद बढ़ी हलचल
मुख्यमंत्री कमलनाथ

लोकसभा चुनाव के नतीजे 23 मई को देश के सामने आएंगे, लेकिन उससे पहले आए आजतक-एक्सिस माई इंडिया एग्जिट पोल के आंकड़ो के मुताबिक नरेंद्र मोदी की सरकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में एक बार फिर वापसी करती हुई नजर आ रही है. जबकि कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का पूरी तरह से सफाया होता दिख रहा है. अगर एग्जिट पोल के आंकड़े नतीजों में तब्दील होते हैं और मोदी सरकार 2014 से ज्यादा ताकतवर बनकर उभरेगी. ऐसे में मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार और कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस सरकार पर संकट के बादल गहरा सकते हैं.

कमलनाथ सरकार पर खतरा?

बता दें कि पिछले साल मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. राज्य की 231 सीटों में से कांग्रेस को 113, बीजेपी को 109, बसपा को दो, सपा को एक और निर्दलीय चार जीतने में कामयाब रहे हैं. इस तरह से देखें तो कांग्रेस और बीजेपी के बीच महज चार सीट का फर्क है. कांग्रेस की सबसे ज्यादा सीटें होने के कारण कमलनाथ ने चार निर्दलीय, दो बसपा के और एक सपा के विधायक के समर्थन से सत्ता पर विराजमान हैं.

हालांकि बीजेपी बहुमत के आंकड़े के बहुत ज्यादा दूर नहीं है. ऐसे में केंद्र में मोदी सरकार वापसी होती है तो कमलनाथ सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. बीजेपी केंद्र के बाद राज्य की सत्ता पर काबिज होने का दांव चल सकती है. कांग्रेस कई बार मध्य प्रदेश में अपने विधायकों के खरीद-फरोख्त का आरोप बीजेपी पर लगाते हुए आशंका जाहिर कर चुकी है. यही वजह है कि अगर केंद्र में मोदी सरकार की वापसी प्रचंड बहुमत के साथ वापसी होती है तो कमलनाथ सरकार के लिए संकट खड़े हो सकते हैं.

बीजेपी के महासचिव और मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि कमलनाथ 22 दिन रहेंगे इस पर भी सवाल है. इससे साफ जाहिर है कि बीजेपी कहीं न कहीं मध्य प्रदेश में सरकार बनाने के मंसूबे अपने दिल में पाल रखी है.

कर्नाटक में कुमारस्वामी पर संकट?

दरअसल कर्नाटक की 225 विधानसभा सीटों में बीजेपी को 104, कांग्रेस को 78, जेडीएस को 37, बसपा को 1, केपीजेपी को 1 और अन्य को 2 सीटों पर जीत मिली थी. इस तरह से किसी भी पार्टी को बहुमत का आंकड़ा नहीं मिला था.बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री की शपथ ली. लेकिन कांग्रेस-जेडीएस के एक साथ आने से वह बहुमत साबित नहीं कर पाए. इसके बाद कांग्रेस ने जेडीएस को समर्थन के साथ राज्य में कुमारस्वामी की सरकार बनाई.

कर्नाटक में लगातार कुमारस्वामी की सरकार पर संकट के बादल छाए हुए हैं. यह बात कुमारस्वामी खुद भी कई बार कह चुके हैं. इसके अलावा कांग्रेस के कई विधायकों की नाराजगी की बातें सामने आती रही है. यही नहीं कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व सीएम सिद्धारमैया और कुमारस्वामी के बीच भी मतभेद की बात कई बार आ चुकी है. ऐसे में लोकसभा चुनाव के लिए कर्नाटक में जिस तरह से एग्जिट पोल आए हैं, उस लिहाज से बीजेपी 2014 से ज्यादा सीटें जीतती हुई नजर आ रही है.

आजतक-एक्सिस माई इंडिया के एग्जिट पोल के मुताबिक मध्य प्रदेश की कुल 29 में से बीजेपी को 26 से 28 और कांग्रेस को 1 से 3 सीटें मिलती हुई दिख रही है. अगर यही आंकड़े नतीजे में दब्दील होते हैं तो कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं. माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी कर्नाटक में सरकार बनाने की एक बार फिर से कोशिश कर सकती है.


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