नई दिल्ली। देश के पहले लोकपाल की जल्द नियुक्ति की उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल का अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का पैनल तैयार करने के लिए सीमारेखा खींच दी है।

कोर्ट ने गुरुवार को सर्च कमेटी से आग्र्रह किया है कि वह फरवरी के अंत तक नामों का पैनल तैयार करे। कोर्ट मामले में सात मार्च को फिर सुनवाई करेगा।

यह आदेश मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एल नागेश्वर राव व संजय किशन कौल की पीठ ने कामनकाज संस्था की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने सरकार से नियुक्ति के संबंध में अब तक हुई कार्यवाही का ब्योरा हलफनामे में मांगा था। कार्मिक मंत्रालय की ओर से कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बताया गया था कि 27 सितंबर को सर्च कमेटी का गठन हो गया था।

अध्यक्ष सहित कुल आठ लोग हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई अध्यक्ष हैं और इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश सखा राम सिंह यादव, पूर्व सालिसिटर जनरल रंजीत कुमार, एसबीआइ की पूर्व चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्या, डाक्टर ललित के. पंवार, शब्बीर हुसैन, एस. खंडवावाला, ए. सूर्य प्रकाश और डाक्टर एएस किरन कुमार सदस्य हैं।

केंद्र की ओर से पेश अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया कि सर्च कमेटी अभी तक काम नहीं शुरू कर पाई है। सर्च कमेटी की 16 जनवरी को बैठक हुई थी लेकिन कमेटी के पास काम करने के लिए जरूरी आफिस स्टाफ, जगह, सेक्रेटरिएट, लोग व अन्य ढांचागत संसाधन नहीं हैं।

इस कारण कमेटी काम करने में दिक्कत महसूस कर रही है। वेणुगोपाल की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने सर्च कमेटी से आग्र्रह किया कि वह फरवरी के अंत तक लोकपाल नियुक्ति के नियम 11 के मुताबिक लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए नामों का पैनल तैयार करे।

इसके अलावा कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सर्च कमेटी को सभी जरूरी मदद और ढांचागत संसाधन मुहैया कराए ताकि सर्च कमेटी तय समय के भीतर काम पूरा कर ले।

सर्च कमेटी लोकपाल अध्यक्ष और सदस्यों के नामों का पैनल तैयार कर के चयन समिति को देती है और चयन समिति उसमें से नियुक्ति के लिए नाम चुनती है।

चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, नेता विपक्ष और प्रख्यात कानूनविद होते हैं। नियम के मुताबिक लोकपाल अध्यक्ष के लिए सर्च कमेटी पांच नामों का पैनल तैयार करेगी जबकि आठ सदस्यों जिनमें चार न्यायिक सदस्य और चार प्रशासनिक सदस्यों के लिए सर्च कमेटी 12-12 नामों का पैनल बनाएगी।

नियम के मुताबिक लोकपाल सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश अथवा असंदिग्ध निष्ठा वाला अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ व्यक्ति हो सकता है जबकि सदस्यों में न्यायिक सदस्य वर्तमान या सेवानिवृत हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश हो सकते हैं।

नई दिल्ली। सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों लिए आरक्षण के मापदंडों को लेकर आखिरकार कई दिनों से जारी ऊहापोह गुरुवार को खत्म हो गई। सरकार ने इसके मापदंड तय कर दिए हैं। सालाना आठ लाख रुपये तक की आय सीमा को यथावत रखा गया है।

हालांकि यह सिर्फ केंद्र सरकार से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों और केंद्रीय नौकरियों में ही अनिवार्य रूप से लागू होगा। राज्यों को छूट दी गई है कि वे अपनी जरूरत और स्थिति के हिसाब से आयसीमा कम-ज्यादा कर सकें।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के मुताबिक, मापदंडों को अंतिम रूप देने के साथ ही उसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय और कार्मिक मंत्रालय (डीओपीटी) को अमल शुरू करने के लिए भेज दिया गया है।

मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, पहले से घोषित मापदंडों में कुछ छोटे-छोटे बदलाव किए गए हैं। इनमें नगरीय क्षेत्र में 100 गज के प्लॉट को 100 वर्ग गज किया गया है, जबकि गैर-अधिसूचित नगरीय क्षेत्र के लिए तय किए गए 200 गज के मापदंड को 200 वर्ग गज कर दिया गया है।

इसके अलावा तय मापदंडों में जो एक अहम बिंदु जोड़ा गया है, उसके तहत इसका लाभ निजी क्षेत्र के वित्तीय मदद न लेने वाले संस्थानों पर भी लागू होगा। इसके लिए जरूरी कानूनी प्रावधानों को तैयार करने का जिम्मा मानव संसाधन विकास मंत्रालय पर छोड़ा गया है।

सूत्रों की मानें तो मापदंड तय करने में यह देरी आयसीमा को लेकर संसद में उठाए गए सवालों के बाद पैदा हुई थी। इसके बाद इसमें बदलाव को लेकर सहमति बन भी गई थी, लेकिन बाद में इसे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के दखल के बाद खारिज कर दिया गया।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय पहले ही यह आरक्षण आगामी शैक्षणिक सत्र से लागू करने की घोषणा कर चुका है। साथ ही इसे लेकर 25 फीसद सीटें बढ़ाने सहित दूसरी तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। पिछले दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने खुद इसकी जानकारी दी थी।

भोपाल। राज्य सरकार ने गुरुवार को 20 आईपीएस अफसरों के तबादले कर दिए। एसटीएफ में एडीजी एसडब्ल्यू नकवी को एडीजी प्रशासन बनाया गया है। वहीं अनुराधा शंकर को एडीजी प्रशिक्षण की जिम्मेदारी दी गई है।

भोपाल डीआईजी (अरबन) धर्मेंद्र सिंह चौधरी को हटाकर पुलिस मुख्यालय भेजा गया है। उनकी जगह बालाघाट रेंज के डीआईजी इरशाद वली को भोपाल लाया गया है। इसके साथ ही 6 जिलों के एसपी भी बदले गए हैं।

वहीं, राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी संदीप भूरिया को सहायक परिवहन आयुक्त बनाया गया है। वे भौंरी स्थित पुलिस अकादमी में एएसपी के तौर पर पदस्थ थे।

भोपाल। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव शुक्रवार को कलेक्टरों से विधानसभा चुनाव में हुए खर्च का हिसाब लेंगे। मिंटो हॉल के कन्वेंशन सेंटर में प्रदेशभर के कलेक्टरों के साथ निर्वाचन कार्यालय की बैठक दोपहर 12 बजे से शुरू होगी।

इसमें लोकसभा चुनाव की तैयारियों के साथ मतदाता सूची को लेकर बात की जाएगी। ईवीएम और वीवीपैट में जिस तरह विधानसभा चुनाव में गड़बड़ी सामने आई थी, उससे निपटने की रणनीति भी बनेगी।मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के अधिकारियों ने बताया कि चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तैयारियां तेज कर दी हैं। पिछले सप्ताह मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी की दिल्ली में बैठक हुई थी।

आयोग ने त्रुटिरहित चुनाव पर जोर दिया है। इसके मद्देनजर सीईओ कांताराव सभी कलेक्टरों से बात करेंगे। इस दौरान मतदाता सूची के काम की समीक्षा करने के साथ ईवीएम और वीवीपैट की गड़बड़ियों की रोकथाम पर जोर दिया जाएगा।

साथ ही कलेक्टरों को चुनाव संबंधी जरूरी दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, क्योंकि 20 से ज्यादा कलेक्टर नए पदस्थ हो गए हैं। इनमें से कुछ तो पहली बार चुनाव कराएंगे। इसके अलावा बैठक में विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए खर्च और भुगतान को लेकर समीक्षा होगी।

इस बार विधानसभा चुनाव के लिए लगभग चार सौ करोड़ रुपए मंजूर किए गए थे। इसमें मतदाता जागरुकता के साथ चुनाव व्यवस्था पर सर्वाधिक राशि खर्च हुई है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय की मंशा है कि लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव से जुड़े सभी भुगतान हो जाएं। बैठक में कुछ प्रेजेंटेशन भी हो सकते हैं।

पंचकूला। 17 साल पहले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में पंचकूला की सीबीआई कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने आरोपी गुरमीत राम रहीम सहित अन्य तीन आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ कोर्ट ने दोषी गुरमीत राम रहीम पर 50 हजार का जुर्माना भी लगाया है। बता दें कि गुरमीत राम रहीम फिलहाल रोहतक की जेल में बंद है, वह दुष्कर्म के मामले में सजा काट रहा है।

सीबीआई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि गुरमीत की पहली सजा पूरी होने के बाद दूसरी सजा की शुरुआत होगी। इसका सीधा मतलब है कि जिस वक्त गुरमीत की इस मामले में सजा की शुरुआत होगी उस वक्त गुरमीत की उम्र लगभग 70 साल की होगी। ऐसे में गुरमीत को अब आगे की जिंदगी जेल में ही बिताना होगी।

साल 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या हुई थी, इस मामले में राम रहीम को आरोपी बनाया गया था, हाल ही में कोर्ट ने गुरमीत राम रहीम को इस मामले में दोषी करार दिया था।

ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में किसान ऋण माफी की प्रक्रिया शुरू होते ही 76 कृषि साख सहकारी समितियों में हुए घोटाले की परतें खुलने लगी हैं। समितियों की ओर से पंचायत पर ऋणदाताओं की सूची चस्पा की तो ऐसे किसान सामने आए, जिन्होंने ऋण लिया ही नहीं, लेकिन वह कर्जदार हैं।

किसानों ने जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की शाखा व समितियों पर पहुंच कर आपित्त दर्ज कराई है। किसानों का कहना है कि जब बैंक से कर्ज लिया ही नहीं तो माफी कैसी? जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की ओर से किसानों को फसल के लिए ऋण साख सहकारी समितियों के माध्यम से दिया जाता है।

पिछले दस साल में बिना कागजी कार्रवाई किए 120 करोड़ का फर्जी ऋण वितरण किया गया। वर्ष 2010 में ऋण वितरण घोटाला सामने आया था, लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार में अच्छी पकड़ होने की वजह से आरोपी बचते रहे। चुनाव से पहले पूर्व विधायक बृजेंद्र तिवारी ने सहकारी बैंक में हुए घोटाले को उठाया, किसान आंदोलन भी किया। प्रशासन ने घोटालेबाजों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन भी दिया, पर कार्रवाई नहीं की।

इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने किसान ऋण माफी का वादा किया और सत्ता में आने के बाद सबसे पहले किसान ऋण माफी को स्वीकृति दी। अब ऋण माफी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पंचायत स्तर पर कर्जदारों की सूची चस्पा की गई है। इसमें ऐसे किसानों के नाम सामने आए हैं, जिन्होंने ऋण लिया ही नहीं। अब ये किसान सहकारी बैंक की शाखाओं पर आपत्ति दर्ज कराने पहुंच गए हैं। उधर, ऋण प्रदान करने का रिकॉर्ड समितियों को नहीं मिल रहा है।

1143 के नाम निकाले थे 5.5 करोड़, 250 किसान मिले ही नहीं

जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की चीनौर शाखा से संबद्ध उर्वा सोसायटी का घोटाला सबसे ज्यादा चर्चित रहा। 1143 किसानों के नाम फर्जी ऋण वितरण कर बैंक को पांच करोड़ 50 लाख की चपत लगाई गई है। जब पूर्व विधायक बृजेंद्र तिवारी ने एक-एक किसान की जांच कराई तो 300 किसानों के पते ही नहीं मिले। शेष किसानों के पास पहुंचे तो उन्होंने बताया कि ऋण लिया ही नहीं।

ऐसे भी मामले-

-बुधवार को आंतरी शाखा पर चैनो बाई के पति लखन सिंह कुशवाह शिकायत दर्ज कराने पहुंचे। उनका कहना था कि जब ऋण लिया ही नहीं तो 10 हजार का कर्ज कैसे मेरे नाम है।

- शीलाबाई के पति काशीराम ने आंतरी शाखा पर आपत्ति दर्ज कराई कि वह पूरा ऋण चुकता कर चुके थे। बैंक की पावती भी है, लेकिन 31 हजार रुपये का ऋण कहां से दर्ज कर दिया?

लाल फॉर्म पर भरवा रहे आपत्ति

समिति पर कर्जदारों की सूची चस्पा हुई तो बड़ी संख्या में किसान आपत्ति दर्ज कराने आने लगे हैं। उनसे लाल फॉर्म भरवा कर आपत्ति दर्ज कराई जा रही है। बैंक को भी नहीं पता कि ऐसे कितने मामले हैं, जिन्होंने ऋण लिया ही नहीं। अब जांच कर किसान को प्रमाण-पत्र दिया जाएगा कि उस पर कोई ऋण बकाया नहीं है।

दो समितियों के खिलाफ एफआइआर

बैंक में गबन करने वाली दो समितियों के खिलाफ एफआइआर करा दी है। सहकारिता से रिकॉर्ड मिलने के बाद दो एफआइआर कराने जा रहे हैं। किसानों की जो आपत्तियां आ रही हैं, उनकी जांच की जाएगी।

- मिलिंद सहस्त्रबुद्धे, प्रभारी महाप्रबंधक जिला सहकारी बैंक

किसान आपत्ति दर्ज कराएं

बैंक में आर्थिक गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है। अगर किसी किसान ने ऋण नहीं लिया है, उसका नाम सूची में है तो आपत्ति दर्ज कराए।

- अनुभा सूद, उपायुक्त सहकारिता ग्वालियर

अपने स्तर पर जांच करा रहे

बैंक से किसानों की सूची मिल गई है। हमारे आंदोलन से जुड़े किसानों को सूची दी जा रही है। अपने स्तर पर जांच करा रहे हैं। जब तक घोटालेबाजों से वसूली नहीं हो जाती है तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

- बृजेंद्र तिवारी, पूर्व विधायक

जांच हो गई है, कार्रवाई बाकी है

बैंक में हुए घोटाले की शिकायतें अपैक्स बैंक, सहकारिता विभाग में की थीं। जांच हो चुकी है। अब सिर्फ कार्रवाई करनी है। घोटाले के दोषी कर्मचारी किसान ऋण माफी के तहत राशि माफ कराना चाहते हैं।

- पं. सतीश शर्मा, सेवानिवृत्त लेखपाल, जिला सहकारी बैंक

कर्नाटक की तरह क्या मध्यप्रदेश में भी बीजेपी ऑपरेशन लोटस को लांच करने के लिए टाइमिंग की तलाश में है? इस तरह की अटकलें इसलिए भी हैं कि भाजपा के दो दिग्गज नेता खुले आम कमलनाथ सरकार को गिराने की चेतावनी दे रहे हैं. भाजपा महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बाद अब नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव भी कह रहे हैं कि जब तक मंत्रियों के बंगले पुतेंगे कांग्रेस सरकार गिर जाएगी.हाईकमान को छींक आ जाए
क्या यह इस बात का संकेत है कि सत्ता से बेदखल भाजपा सरकार बनाने के लिए बेचैन है? और किसी भी दिन मध्यप्रदेश में वही नजारा देखने मिल सकता है जो आज कर्नाटक में दिखाई दे रहा है. कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं. उनके बयान मायने रखते हैं. उन्होंने कहा था बस हाईकमान को छींक आ जाएं, बॉस का इशारा हो जाए, कमलनाथ सरकार पांच दिन में गिरा देंगे. अब उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए गोपाल भार्गव ने मैदान पकड़ लिया है. वे कह रहे हैं इस सरकार में हार्ट किसी और का है, दिल किसी और का और किडनी किसी और की.इन बयानबाजियों में हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान नहीं कूदे हैं. लेकिन वे कुछ शालीनता से पहले ही अपनी बात कह चुके हैं कि 'हो सकता है सीएम हाउस लौटने में उन्हें पांच साल से भी कम वक्त लगे.

संशय का माहौल
भाजपा नेताओं की ओर से आ रही इन खुलेआम चेतावनियों ने कमलनाथ सरकार को लेकर संशय का माहौल पैदा कर दिया है. 114 विधायकों के साथ सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस बहुमत से दो नंबर कम है. सपा और बसपा के 3 विधायक और 4 निर्दलीय विधायकों के समर्थन से वो अपनी सरकार बना पाई है.सत्ता का खेल चला
हाल ही में हुए स्पीकर चुनाव का माहौल भी बता चुका है कि किस तरह प्रदेश की राजधानी भोपाल में सत्ता का खेल चलता रहा. बीजेपी के दो कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा पर विधायकों की खरीद- फरोख्त के आरोप लगे. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने खुलकर आरोप लगाए कि किस तरह सौदेबाजी हो रही है कांग्रेस विधायक को बंधक बनाने की कोशिश हुई है.

प्लान चौपट
हालांकि स्पीकर के बहाने कांग्रेस को मॉरल डिफिट देने का भाजपा का प्लान कामयाब नहीं हुआ. देर रात तक चलीं तिकड़म के बाद भी वो अपने लिए स्पष्ट बहुमत नहीं जुटा पाई. उसका ये खामियाजा भुगतना पड़ा कि उसे डिप्टी स्पीकर का पद भी गंवाना पड़ा .दिग्विजय ने झोंकी ताकत
भाजपा की इस उठापटक का असर ये है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार जल्द ही कैबिनेट को बड़ा करने जा रही है. जिसमे बसपा और सपा के साथ कुछ निर्दलीय विधायकों को जगह दिए जाने की चर्चा है. लेकिन फिर भी मामला इतना आसान नहीं है. कांग्रेस के ही कई विधायक असंतुष्ट हैं और दिल्ली में राहुल गांधी के दरबार तक दौड़ लगा चुके हैं. उन्हें मंत्री बनना है. यानी मामला अंदरूनी घमासान का भी है. कब कौन कहां से सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दे. चुनाव के पहले तक जितनी एकजुट और मजबूत कांग्रेस दिखी है सरकार बनते ही वो आपसी फूट और खींचतान में उलझ गई है. कमलनाथ सरकार की मज़बूती अब एक चुनौती दिखाई दे रही है. इन हालातों से निपटने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह अपनी ताकत झोंकते दिखाई दे रहे हैं.

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