अभाविप की प्रान्त कार्यकारणी घोषित
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 64 वां राष्ट्रीय अधिवेशन  कर्णावती गुजरात में संपन्न हुआ जिसमें मध्य भारत प्रांत का 51 वा अधिवेशन भी सम्पन्न हुआ , जिसकी जानकारी देते हुए जिला संयोजक वेदांश सविता ने बताया कि शिवपुरी विभाग संयोजक आशीष शर्मा निवासी श्योपुर को प्रान्त सह मंत्री और शिवपुरी जिले से मयंक राठौर निवासी हाउसिंग बोर्ड, राहुल पड़रिया निवासी महावीर नगर, गोविंदा शर्मा निवासी पिछोर एवं मनशिखा गोयल निवासी शिवपुरी को प्रांत कार्यकारिणी सदस्य बनाया गया है ।

शिवपुरी शहर में रहने वाली रिया माथुर और दिव्या भगवानी ने
चांद का टुकड़ा प्लेटफॉर्म के तहत एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें,जो बाहरी खूबसूरती है वो कहा प्यार है, जो उम्र के निशानों के साथ और गहरा हो जाए हां वही है प्यार यह बात  दिव्या भगवानी ने कही , ए  दिसंबर रुक जा जरा कुछ किससे कुछ यादें  अपने साथ लेता जा, यह बात रिया माथुर ने कही
।अगर जाना है तो शोक से जा (तरुण शर्मा) , जागती आँखो से एक ख्वाब ढूँढता है, मैं हर पल तुझे अपने पास ढूंढता हूं यह आशीष शर्मा ने कहा। , बहुत प्यार है कहकर रोने लगा यह बात प्रफुल शर्मा ने कही , वक़्त की मुलाकात   को प्रियंका राजपूत ने बयान किया। , आज बैठे-2 ये ख्याल आया ऐसा मयंक राठौर ने कहा  , पढ़ ले किताबी आंखे पढ़ सके जो ए जालिम वैशाली पाल  ने कहा, काफी कुछ कहना है (यश खरे) , एक पल में जो टूट जाए( शुभम शर्मा) , छुपा लिया पूरी दुनिया को ,यह अपूर्वा श्रीवास्तव ने कहा।

कांग्रेस-भाजपा की सियासी खींचतान ने खराब की बैंकों की हालत, 21 बैंकों ने रबी के लिए कर्ज बांटना किया बंद, 12 में तालाबंदी के हालात


 


भोपाल. प्रदेश में एक तरफ किसानों का कर्ज माफ करने की तैयारी चल रही है तो दूसरी तरफ रबी के लिए उन्हें बैंकों से कर्ज मिलना बंद हो गया है। वोट बैंक की राजनीति ने 12 जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों को तालाबंदी की कगार पर ला दिया है। इसके चलते बाकी बैंकों ने भी रबी सीजन में किसानों को कर्ज बांटना बंद कर दिया है।

रबी सीजन में किसानों को करीब 2000 करोड़ का कर्ज बांटा जाना है। इसमें 1200 करोड़ नाबार्ड और 800 करोड़ राज्य सरकार को देना है, लेकिन अब तक सहकारी बैंकों को यह राशि नहीं मिली है। सहकारिता विभाग ने सरकार से करीब 4000 करोड़ रुपए मांगे हैं, लेकिन वित्त विभाग ने सरकारी खजाने की हालात खराब बताकर इसे रोक दिया है। दूसरी ओर अभी सरकारी खजाने पर कर्जमाफी का करीब 35 हजार करोड़ का बोझ और पडऩा है। इसलिए बैंकों की हालत सुधरने की राह कठिन है। अब इसकी परेशानी किसानों को उठानी पड़ सकती है।



12 बैंक खस्ताहाल, नहीं दे पा रहे कर्ज

प्रदेश की 38 सहकारी बैंकों में से 12 की हालत खराब है, इसलिए ये रबी के लिए कर्ज नहीं बांट रही हैं। इन बैंकों को दतिया में 86 करोड़, ग्वालियर में 35 करोड़, भिंड में चार करोड़, भोपाल में 21 करोड़, रीवा में 78 करोड़, सतना में 54 करोड, सीधी में 13 करोड़ और टीकमगढ़ में छह करोड़ का नुकसान हुआ है। इधर, रिजर्व बैंक के नियम का पालन नहीं करने पर नाबार्ड पहले ही धारा-11 में चार सहकारी बैंकों को पैसा देना बंद कर चुका है। इसमें रीवा, सतना, दतिया, ग्वालियर की बैंक शामिल हैं। 

इनकी हालत अच्छी, पर कर्ज बांटना बंद- शिवपुरी, होशंगाबाद, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर, जबलपुर, नरसिंहपुर, कटनी और राजगढ़।

चुनाव में वसूली रोकने से बढ़ा संकट

चुनाव के ठीक पहले भाजपा सरकार ने किसानों को जमकर पैसा बांटा। उस समय बैंकों को कर्ज की वसूली करने से भी रोक दिया गया था। यहां तक कि सभी 38 सहकारी बैंक समर्थन मूल्य की खरीदी का पैसा किसानों के खाते में आने पर भी अपनी बकाया राशि नहीं काट पाए। इस दौरान किसानों ने भी बैंकों को कर्ज चुकाना बंद कर दिया था। बाद में कर्जमाफी के चलते भी किसानों ने पैसा नहीं चुकाया। इससे बैंकों का रिजर्व फंड खत्म हो गया।

अपेक्स बैंकों का 940 करोड़ अटका

अपेक्स बैंक की जिला शाखाओं में डिफॉल्टर किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब हालत ये है कि अपेक्स बैंक का 940 करोड़ रुपया इस डिफॉल्ट के दायरे में है। इसमें ग्वालियर में 30 करोड़ रुपए, रायसेन में 285 करोड़, राजगढ़ में 39 करोड़, मुरैना में 168 करोड़, दतिया में 77 करोड़, होशंगाबाद 27 करोड़, सीधी 103 करोड़ और जबलपुर में 292 करोड़ रुपए डिफॉल्टर फंड में हैं। चुनावी चक्कर में पिछले चार महीनों से रिकवरी ठप है। इस कारण 
बैंकों पर धीरे-धीरे बोझ बढ़ता ही चला गया।


शिवपुरी मे शिक्षित प्रवीण कक्कड मुख्यमंत्री कमलनाथ के ओ.एस.डी.बने.
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शिवपुरी।विगत दिवस मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रवीण कक्कड की नियुक्ति  अपने विशेष कर्तव्यस्थअधिकारी(osd)के पद पर की जैसे ही उपरोक्त खबर शिवपुरी के प्रिय मित्रो उतम बंसल,चंदा रधुवंशी, ओम रधुवंशी, श्री प्रकाश शर्मा ,सुरेश सिकरबार,प्रो.ए.पी.एस.चोहान, डा.भूपेन्द्र विकल,करूणेश शर्मा इत्यादि ने हर्ष व्यक्त किया प्रवीण को बधाई प्रेषित की.
प्रवीण कक्कड की शिक्षा बाल शिक्षा निकेतन(छिबर स्कूल)मे हुई,इसके शा.महाविद्यालय मे अध्यनरत रहकर जीवाजी युनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र मे एम.ए.किया, गोल्ड मेडिल प्राप्त कर सम्मानित हुये.
फुटबॉल, हाकी के श्रेष्ठ खिलाड़ी भी है शिवपुरी के पोलो ग्राउण्ड मे खेल कर राज्य स्तरीय टीम मे खेल कर अनेक पुरस्कार प्राप्त किये.
आज भी शिवपुरी के पुराने मित्रो के प्रत्येक सुख व दुख के क्षण मे सामिल होते है.
इनकी माँ.शिवपुरी के जिला चिकित्सालय मे सीनियर नर्स श्रीमती कक्कड भी बहुत ही मिलनसार रही है.
पुलिस विभाग मे प्रवीण की नियुक्ति हुई ओर इन्दौर के अनेक थानो मे टी.आई.के पद पर रहे.इसके उपरांत आर.टी.ओ.विभाग मे सेन्धवा बेरियर पर सबसे जादा कार्य किया.
राजनीति मे रुचि होने के कारण तात्कालिक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के करीब आ गये.चरण दास मंहत जब गृहमंत्री के साथ कार्य किया. इसके उपरांत कान्ति लाल भूरिया के साथ जुड़े.भूरिया जी केन्द्रीय मंत्री बने तब इन्होंने कृषि मंत्रालय नई दिल्ली मे कार्य किया.भूरिया जी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने तब प्रदेश मे पार्टी के संपूर्ण कार्य संपादित किये.
वर्तमान चुनाव मे कांग्रेस के चुनाव मेनेजमेंट की भूमिका निभाई ओर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इन्हें महत्वपूर्ण पद प्रदान किया.
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भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने संकेत दिए हैं कि राम मंदिर के मुद्दे पर उनकी पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार अध्यादेश भी ला सकती है. बुधवार को उन्होंने कहा कि राम मंदिर निर्माण का मुद्दा फिलहाल कोर्ट में है, लेकिन अध्यादेश भी एक रास्ता है. राम माधव का कहना था, ‘अध्यादेश का रास्ता हमेशा खुला है, लेकिन मामला अभी कोर्ट में है और चार जनवरी को इस पर सुनवाई है. हमें उम्मीद है कि अदालत इसे त्वरित ढंग से निपटाएगी. अगर ऐसा नहीं होता है, तो हम अन्य रास्ते भी तलाशेंगे.’


फिलहाल चल रहे संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान जिन मुद्दों पर खूब शोर हो रहा है, उनमें से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा भी एक है. हाल के समय में इस सवाल ने हिंदू संगठनों और साधु-संतों को काफ़ी उत्तेजित किया है कि आख़िर मौजूदा केंद्र सरकार कब राम मंदिर के निर्माण के लिए क़ानून लेकर आएगी. बीते साढ़े चार साल से भी ज़्यादा के कार्यकाल में वह इस संबंध में कोई विधेयक लेकर नहीं आई, इसलिए अब यह मांग भाजपा के अंदर से भी ज़ोरदार तरीक़े से उठाई जा रही है कि सरकार अध्यादेश लाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ करे.

मौजूदा संसद सत्र के ख़त्म होने में अभी करीब दो हफ्ते का वक्त बाक़ी है. इसलिए यह देखना होगा कि सरकार राम मंदिर को लेकर अध्यादेश लाती है या नहीं. कई जानकारों का कहना है कि वह ऐसा कर सकती है. लेकिन इसके कारणों को लेकर राय बंटी हुई है. कुछ जानकारों का कहना है कि राम मंदिर मुद्दे पर सनातन समाज की ‘बेक़ाबू’ होती भावनाओं और अपने 2014 के चुनावी वादे के मद्देनज़र सरकार अध्यादेश ला सकती है. वहीं, दूसरी तरफ़ कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी सरकार अर्थव्यवस्था के अहम मोर्चों के अलावा पिछले आम चुनाव में किए अन्य कई वादों को पूरा करने में विफल रही है. उनके मुताबिक़ इसलिए इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए अब उसने वापस राम मंदिर का रुख़ किया है और इसी के तहत वह संसद में अध्यादेश भी ला सकती है.

ऐसे में यह जान लेना ज़रूरी है कि मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा ने अपने पिछले घोषणापत्र में क्या कहा था, और अब जिस तरह मंदिर के लिए अध्यादेश लाए जाने की बात हो रही है, क्या वह उसके चुनावी वादे से मेल खाता है.

अस्पष्ट चुनावी वादा

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में जो ढेर सारे वादे किए थे, उनमें राम मंदिर का मुद्दा काफ़ी नीचे था. पार्टी ने उसे ‘सांस्कृतिक विरासत’ बताते हुए वादा किया था कि वह ‘संविधान के दायरे में’ रह कर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी संभावनाएं तलाशने का काम करेगी.

जानकारों का कहना है कि इस चुनावी वादे में मंदिर को लेकर तो भाजपा का रुख़ स्पष्ट होता है, लेकिन यह पता नहीं चलता कि उसके निर्माण के लिए पार्टी करेगी क्या. वे सवाल करते हुए कहते हैं कि पार्टी ने जो वादा किया था, उसमें ‘संवैधानिक दायरे’ का ज़िक्र कर क्या यह संदेश नहीं दिया गया कि मंदिर निर्माण के लिए कोई ऐसा रास्ता चुना जाएगा जिस पर सभी राजनीतिक दलों व वर्गों की सहमति हो और किसी तरह का विवाद पैदा न हो.

अब सवाल उठता है कि क्या अगले आम चुनाव से पहले आनन-फ़ानन में अध्यादेश लाना ही वह ‘संभावना’ थी जिसका केवल ज़िक्र भाजपा ने अपने घोषणापत्र में नहीं किया था. अगर ऐसा है, तो मंदिर निर्माण को लेकर सरकार के इस तरीक़े पर कई संवैधानिक व राजनीतिक सवाल उठते हैं. इसका एक कारण तो अध्यादेश का अपने आप में विवादित होना है.

सरकारों का हथियार रहा है अध्यादेश

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 123 के मुताबिक़ जब संसद सत्र में न हो, और विषय इतना ‘गंभीर’ या ‘ज़रूरी’ हो जिसके लिए सत्र के आने तक का इंतज़ार नहीं किया जा सकता, तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति अध्यादेश पारित कर सकते हैं. लेकिन कौन सी स्थिति ‘बेहद गंभीर’ या ‘ज़रूरी’ होनी चाहिए, इसे लेकर किसी तरह की स्पष्टता नहीं है.

जानकारों के मुताबिक़ यही वजह है कि अलग-अलग सरकारों ने अध्यादेश को हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. वे अपने राजनीतिक हितों के हिसाब से विषयों व उनसे जुड़ी स्थितियों को ‘बेहद गंभीर’ और ‘ज़रूरी’ बता कर अध्यादेश पारित करवाती रही हैं. रिपोर्टों के मुताबिक 1950 से अब तक 700 से भी ज़्यादा अध्यादेश पारित करवाए गए हैं. यानी 68 सालों का औसत निकालें तो सरकारों को हर साल दस से भी ज़्यादा बार कोई विषय बेहद ‘गंभीर’ या ‘आपात’ वाला लगा है.

राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट

अध्यादेश का इतिहास जानने के बाद इस संभावना को ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि दरअसल चुनाव की ‘गंभीरता’ के मद्देनज़र सरकार मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश ला सकती है. लेकिन क्या राष्ट्रपति के लिए भी किसी वर्ग विशेष की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा कोई मुद्दा इतना गंभीर होगा कि वे सरकार की सलाह पर अध्यादेश पारित कर देंगे. क्या राष्ट्रपति को इस बात का भान नहीं होगा कि देश की सर्वोच्च अदालत में अयोध्या का मुद्दा लंबित है और एक और महत्वपूर्ण वर्ग है जो इससे जुड़े अदालती फ़ैसले को ही मान्यता देने की बात करता है?

अतीत में सरकारों ने ग़ैरज़रूरी तरीक़े से अध्यादेश पारित करवाए हैं, लेकिन पूर्व राष्ट्रपतियों की आशंका के चलते उन्होंने अलग-अलग विषयों पर अध्यादेश लाने से हाथ पीछे भी खींचे हैं. मौजूदा सरकार ने भी कई मुद्दों को अहम या गंभीर बताते हुए अध्यादेश पारित करवाए हैं. लेकिन इसे लेकर जहां राजनीतिक विरोधियों ने उसकी आलोचना की है, वहीं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेश के इस्तेमाल को लेकर सरकार को आगाह भी किया था.

वहीं, अध्यादेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पूर्व में कह चुका है कि सरकारें राष्ट्रपति के इस विशेषाधिकार का ग़लत इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. वह अदालती मामलों में सरकारी दख़ल को भी नापसंद करता रहा है. एससी-एसटी एक्ट के कथित रूप से कमज़ोर होने के मामले में यह हो चुका है. जब सरकार कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ संशोधन विधेयक लेकर आई तो कोर्ट ने नोटिस जारी कर सरकार से जवाब-तलब किया था. राम मंदिर के लिए अध्यादेश लाए जाने की स्थिति में इन दो संस्थानों की भूमिका भी अहम होगी.

दो दलों की उछल-कूद

बहरहाल, इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की सक्रियता देखें तो केवल भाजपा और शिवसेना प्रमुख रूप से अध्यादेश लाने की बात करते नज़र आते हैं. कई लोग सवाल करते हैं कि क्या केवल दो दलों की उछल-कूद से राम मंदिर का मुद्दा संवैधानिक रूप से बेहद ‘गंभीर’ और ‘ज़रूरी’ हो जाता है, क्योंकि बाक़ी लगभग अन्य सभी दल सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करने की बात करते हैं. इनमें भाजपा विरोधी ख़ेमे के नेताओं के अलावा उसके सहयोगी दल भी शामिल हैं.

वहीं, मंदिर निर्माण के लिए क़ानून लाने पर ख़ुद भाजपा की स्थिति स्पष्ट नहीं है. पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हाल में भाजपा के संसदीय दल की बैठक में राम मंदिर का मुद्दा उठा था. इसमें कुछ सांसदों ने पूछा कि मंदिर का निर्माण कब होगा. इस पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उनसे धैर्य रखने को कहा. गृह मंत्री ने सांसदों से कहा कि विपक्ष का कोई नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जितना लोकप्रिय नहीं है और ऐसे में उन्हें लोकसभा चुनाव के लिए काम करना चाहिए.

दिखावे के लिए अध्यादेश?

लेकिन कई जानकार मानते हैं कि सरकार लोगों को यह यक़ीन दिलाने के लिए अध्यादेश ला सकती है कि भाजपा ने राम मंदिर के लिए सिर्फ़ प्रतिबद्धता नहीं जताई, बल्कि उस पर अमल भी किया. अध्यादेश संसदीय विधेयक की तरह ही होते हैं. लेकिन ये अस्थायी होते हैं और इन्हें छह महीने के अंदर स्थायी कराना होता है. अगर ऐसा न हो तो अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाता है.

एक वर्ग के मुताबिक राम मंदिर से जुड़ा अध्यादेश इस सत्र में लाकर सरकार उसे आम चुनाव से ठीक पहले बजट सत्र में पेश कर पारित कराने का प्रयास कर सकती है. यह देखना होगा कि वह इसमें सफल रहेगी या नहीं, लेकिन इस सबसे वह यह तो जता ही देगी कि मंदिर के लिए उसने हरसंभव प्रयास किया, साथ ही यह भी कहेगी कि उसने जो किया अपने चुनावी वादे के मुताबिक़ संविधान के दायरे में किया.


भोपाल। भाजपा द्वारा प्रदेश में जल्द ही सत्ता पर वापस काबिज होने की बातों के बीच अब ये भाजपा के बयान सच होते दिख रहे हैं। तमाम तरह की बयान-बाजियों के बीच कांग्रेस द्वारा मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज कांग्रेस के विधायक बगावत पर उतर आए हैं।


वहीं इनके अलावा निर्दलीय व छोटी पार्टियों के विधायक भी जो कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं, बताया जाता है कि वे भी कांग्रेस द्वारा मंत्री पद नहीं दिए जाने से नाराज हो गए हैं। जिसके चलते सूत्रों के अनुसार वे भी सरकार से समर्थन वापसी का विचार कर रहे हैं।


वहीं कुछ दिनों पहले ही केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने प्रदेश मेंं भाजपा की हार की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक में संकेत दिए थे कि प्रदेश में जल्द ही भाजपा सत्ता में आ सकती है।


रविवार को स्थानीय उत्सव भवन में सत्ता से जाने के बाद भाजपा का पहला कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किया गया था। ऐसे में अब कांग्रेस के सामने खड़े हुए इस संकट को कई लोग भाजपा की नई रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं।


कांग्रेस में बगावत...
वहीं गुरुवार को सामने आई कांग्रेस में ये बगावत और समर्थकों के विरोध में आने से मध्यप्रदेश में 15 साल बाद वापस सत्ता में आई कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। वहीं विरोध के स्वर सहित इस्तीफे के सामने आने से सरकार में हड़कंप मच गया है।


ऐसे में सूत्रों का कहना है इस आपात स्थिति में कांग्रेस के कई नेता मुश्किल के दौर से निकलने के लिए जल्द ही मिंटिग करने जा रहे हैं।


ये है मामला...
दरअसल मध्यप्रदेश में 2018 में बनी कांग्रेस सरकार के मंत्रियों को विभाग दिए जाने से पहले ही कांग्रेस में दो फाड़ की स्थिति आ गई है। ऐसे में सरकार को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं भी शुरू हो गईं हैं।


वहीं बताया जाता है कि नाराज कांग्रेसी किसी भी स्थिति में बिना अपने क्षेत्र को उपेक्षा को लेकर तैयार नहीं हैं। वे किसी भी स्थिति में अपने क्षेत्र के एक नेता व वरिष्ठ नेताओं को कैबिनेट में जगह दिलवाना चाहते हैं।


सामने आ रही सूचना के अनुसार अपने क्षेत्र को उपेक्षा से बचाने के लिए कांग्रेस विधायकों ने बगावत शुरू कर दी है। वहीं दूसरी ओर ये भी सूचना आ रही है कि सपा, बसपा सहित निर्दलीय विधायकों ने भी सरकार से अपने हाथ पीछे खींच लेने का निर्णय ले लिया हैं।


सूत्रों के अनुसार यदि कल तक इन निर्दलीय विधायकों को सरकार में शामिल नहीं किया जाता है, तो वे सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं। ऐसे में कमलनाथ सरकार के सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।


इन्होंने दिया इस्तीफा...
: मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए जाने से नाराज पूर्व मंत्री ऐदल सिंह कंसाना के समर्थन में सरकार बनने के बाद कांग्रेस पार्टी से पहला इस्तीफा।
: सुमावली विधानसभा से ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मदन शर्मा ने दिया इस्तीफा।

बताया जाता है कि वे मुरैना श्योपुर से 8 में से 7 सीट जीतने के बाद भी कांग्रेस से किसी को भी मंत्री नहीं बनाए जाने से हैं। साथ ही इनकी ओर से सरकार पर मुरैना जिले की उपेक्षा का आरोप भी लगाया गया है। वहीं चर्चा है कि मदन शर्मा के इस्तीफे के बाद मुरैना से और भी कांग्रेस कार्यकर्ता पार्टी छोड़ सकते हैं।



गिर जाएगी सरकार!


दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थी वहीं यहां भाजपा को 109 सीटों के साथ संतोष करना पड़ा। जबकि अन्य निर्दलीय व छोटे दलों को मिली।


ऐसे में कांग्रेस को बहुमत के लिए इन अन्य से सहयोग लेना पड़ा। वहीं जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस में दो फाड़ होते हैं, या निर्दलीय सहित बसपा व सपा विधायक अपना समर्थन वापस ले लेते हैं, तो सरकार गिरना तय माना जा रहा है।


वहीं इससे पहले शपथ ग्रहण समारोह वाले दिन भी निर्दलीय विधायकों ने कार्यक्रम से दूरी बना ली थी। इसी दिन यानि मंगलवार की सुबह 
सरकार के मंत्रिमंडल की घोषणा के साथ ही मंगलवार को सभी निर्दलीय व छोटे दलों के सदस्यों ने एक साथ मीटिंग की। जो तकरीब 1 घंटे तक चली, इसके बाद सभी एक साथ होटल से निकल गए।


सूत्रों का कहना था कि सरकार के लिए सहयोग देने वाले इन सदस्यों की गुपचुप तरीके से हुई इस मीटिंग के चलते हर कोई सकते में आ गया है। वहीं लोग इसे भाजपा के पूराने बयानों से जोड़ते हुए देख रहे है। ऐसे में माना जा रहा है कि यदि इन सदस्यों ने कोई कड़ा फैसला लिया है तो कांग्रेस को सरकार से हटना पड़ सकता है।


नई दिल्ली। तलाक, तलाक, तलाक कहकर पत्नी को छोड़ने के मुस्लिम समाज के प्रचलन पर तीन साल जेल की सजा को लोकसभा ने मंजूरी दे दी है। कई विपक्षी दलों का विरोध मुख्यतः इसी बिंदु पर था। हालांकि, जिस तरह सदन में राजनीतिक खींचतान दिखी और वोटिंग से पहले विपक्षी दलों ने वाकआउट किया, उससे साफ है कि राज्यसभा की राह आसान नहीं होगी।
कांग्रेस का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछली बार कांग्रेस ने कुछ मांगों के साथ इसका समर्थन किया था। मुस्लिम महिलाओं को एक साथ तीन तलाक यानी तलाक बिद्दत से निजात दिलाने वाला ऐतिहासिक मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2018 गुरुवार को लोकसभा से पारित हो गया।
लगभग चार घंटे तक चली बहस में विपक्ष ने सजा का प्रावधान हटाने की मांग की। विधेयक को संयुक्त प्रवर समिति में भेजे जाने की भी मांग की गई। विपक्षी दलों का कहना था कि मुस्लिम महिलाओं की ओर से सजा का विरोध किया जा रहा है। सपा, राजद जैसे दलों ने सीधा आरोप लगाया कि सरकार केवल राजनीतिक कारणों से इसे पारित कराना चाहती है।
इसी बहाने राजनीति भी साधी गई और सरकार को याद दिलाया गया कि कई राज्यों में महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है। पहले उसे दुरुस्त किया जाना चाहिए। सबरीमाला मामले में कोर्ट के आदेश की भी याद दिलाई गई और कहा गया कि अगर वहां आस्था की बात की जा रही है, तो फिर इसमें क्यों आस्था को नकारा जा रहा है। दूसरी ओर भाजपा के कई वक्ताओं के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने साफ कर दिया कि सरकार महिलाओं की बराबरी के लिए यह कानून लाने के लिए कृत संकल्प है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद 477 ऐसे मामले सामने आए हैं।
अध्यादेश लाने के बाद तत्काल तीन तलाक की घटनाओं में कमी आई है। राजनीति तो कांग्रेस के वक्त हुई थी, जब शाहबानो को न्याय नहीं मिला। रविशंकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम भी लिया और कहा कि उस वक्त सरकार ने दबाव में शाहबानो का अधिकार छीन लिया था। उन्होंने एक खबर का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को देखते हुए ही अब पाकिस्तान में भी इसे दंडनीय बनाने की बात हो रही है और यहां इसका विरोध हो रहा है, जो उचित नहीं है।

विपक्षी दलों के एक जैसे सुर अगर राजनीति की बात की जाए तो कई बार सदन में दिखा कि मुस्लिम महिला और मुस्लिम पुरुष के अधिकार को लेकर लड़ाई तेज थी। चर्चा के दौरान कुछ देर के लिए कांग्रेस समेत राजद, सपा, तृणमूल कांग्रेस के कुछ सदस्य लॉबी में इकट्ठे हुए और कुछ रणनीति के साथ वापस आए। सबके सुर लगभग एक जैसे थे। जब वोटिंग की बारी आई, तो विपक्ष में वामदल के साथ-साथ केवल असदुद्दीन ओवैसी ही मौजूद रहे। बाकी दलों ने वाकआउट किया।
विरोध के चलते बिल में संशोधन विपक्ष के विरोध के चलते सरकार ने विधेयक में कुछ संशोधन करके प्रावधानों को थोड़ा लचीला किया है। नए विधेयक में तत्काल तीन तलाक पर तीन साल की सजा का तो प्रावधान है, लेकिन इसे समझौता योग्य बनाया गया है। पीड़िता का पक्ष सुनने के बाद जमानत का प्रावधान भी शामिल किया गया है। शिकायत भी पीड़िता या उसका करीबी रिश्तेदार ही करा सकता है।
विपक्ष ने राज्यसभा में वाकआउट नहीं किया, तो बढ़ेगी मुश्किल

बताया जा रहा है कि राज्यसभा में रणनीति तय करने के लिए विपक्षी दलों की अलग से बैठक होगी। -अगर वहां भी वाकआउट हुआ, तो विधेयक कानून की शक्ल लेगा। वरना मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पिछले वर्ष भी लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा में जाकर विधेयक अटक गया था। इसके बाद सरकार ने अध्यादेश लाकर तत्काल तीन तलाक को दंडनीय अपराध घोषित किया। अध्यादेश छह महीने तक ही प्रभावी रहता है। इस दौरान संसद सत्र होने पर उसे पारित कराना होता है।



भोपाल। सत्ता में आते ही ताबड़तोड़ तबादले कर रहे सीएम कमलनाथ को चुनाव आयोग ने लाल झंडा दिखा दिया है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसकी इस सूचना के बाद अब मध्यप्रदेश में ऐसे किसी भी अधिकारी या कर्मचारी का ट्रांसफर नहीं किया जा सकेगा जो चुनाव ड्यूटी में लगा हुआ है।

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी श्री व्ही. एल. कान्ता राव ने बताया कि 26 दिसम्बर 2018 के बाद निर्वाचन आयोग की बिना अनुमति के निर्वाचन से जुड़े अधिकारियों जैसे - जिला निर्वाचन अधिकारी, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का स्थानांतरण राज्य शासन के द्वारा नहीं किया जा सकेगा।

बता दें कि अब सीएम कमलनाथ अब तक 50 से ज्यादा आईएएस अफसरों के तबादले कर चुके हैं। इनमें से 25 से ज्यादा अफसर चुनाव कार्य में लगे हुए थे। मंत्रिमंडल के शपथ लेते ही पीसी शर्मा और सज्जन सिंह वर्मा की शिकायत पर 2 अधिकारियों के तबादले कर दिए गए। अब आलोचक इस तरह के तबादलों को बदले की कार्रवाई कहने लगे हैं। 

शिवपुरी - प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कार्यशाला आज मुडेरी में एचडीएफसी बैंक कंपनी  शिवपुरी तहसील के डिस्टिक इंचार्ज सुशील तिवारी द्वारा रखी गई इस कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में कृषि विभाग के अधिकारी एन .पी. कुशवाह सौरव शर्मा आशीष सेन ओर सभी किसान भाई उपस्थित हुए। इस कार्यशाला में सौरभ शर्मा ने सभी किसान भाइयों को समझाया कि रवि की फसलों में पिछले साल करीबन 40000 हजार किसानों ने  बीमा कराया और इस बीमा का लाभ लिया ओर आप भी फसल बीमा का लाभ ले अभी सभी किसानों ने रवि मौसम में  गेहूं ,चना ,सरसों की बोनी शुरू कर दी है जिससे सभी किसानों को कभी फसल अगर नष्ट भी होती है तो बीमा कंपनी आपको मुआवजा भी देगी सभी किसानों को बीमा कराना है तो अपने दस्तावेज भू अधिकार पुस्तिका, बुवाई प्रमाण पत्र पटवारी द्वारा , पहचान पत्र आधार कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक की प्रतिलिपि लाए और जिस किसानों कि बैंक खाते हैं उस में जमा कराएं फसल बीमा योजना का लक्ष्य किसान बंधुओं को बीमा संरक्षण प्रदान करना ताकि प्राकृतिक आपदाओं कीट और बीमारियों के हमले के कारण किसी अधिसूचित फसल की विफलता की दशा में उन्हें आर्थिक सहयोग मिल सके  इसलिए किसानों के लिए यह बीमा कंपनी सभी किसानों का बीमा करना चाहती है एचडीएफसी बैंक बी.सी.सी आशीष सेन ने सभी किसानों को बताया कि रवि फसल की लास्ट डेट 15 जनवरी है जिसमें गेहूं की रेट 92 रुपए बीघा ,चना की ₹42 बीघा , सरसों की 71.40 रुपए बीघा की राशि है अगर किसी भी किसानों को योजना के बारे में जानकारी प्राप्त करनी है तो बैंक का टोल फ्री नंबर 1800 26 60 70 0 है यह कार्यशाला चाय नाश्ता के साथ संपन्न की गई

भोपाल। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बुधवार को मंत्रियों को विभाग बांटना तय किया था, लेकिन पसंदीदा विभाग की मांग पर पांच मंत्रियों के अड़ जाने से बंटवारा अटक गया। कुछ मंत्रियों ने सीएम को साफ कह दिया कि उन्हें पसंद का विभाग ही चाहिए।


इसे लेकर देररात तक मशक्कत चली। अब गुरुवार को विभागों का आवंटन हो सकता है। इधर, कमलनाथ ने कैबिनेट से पहले मंत्री-अफसरों की बैठक में स्पष्ट किया कि पहले की सरकार की व्यवस्था अब नहीं चलेगी। सात मिनट में उन्होंने चार बार कहा कि सरकार सीएम सचिवालय नहीं, मंत्री-अफसर मिलकर चलाएंगे।


यदि उनके स्तर का कोई काम मुझ तक आया तो सीधे मंत्री-अफसर का गला पकडूंगा। जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम होना चाहिए।



जानिये किसे क्या चाहिए!...


1. सज्जन सिंह वर्मा: कमलनाथ ने वर्मा को लोक निर्माण विभाग और तरुण भनोत को नगरीय प्रशासन विभाग देना चाहा, लेकिन सज्जन नगरीय प्रशासन की मांग पर अड़े हैं। बुधवार को कैबिनेट के समय भी वे नहीं पहुंचे। बाद में बुलाया गया तो देरी से पहुंचे। वर्मा की जिद के कारण अब उन्हें यह विभाग दिया जा सकता है।


2. जीतू पटवारी : युवा मंत्री पटवारी को सीएम ने पर्यटन, युवा कल्याण व खेल विभाग देना तय किया है। लेकिन, पटवारी ने जनसम्पर्क व कृषि विभाग मांगकर आवंटन अटका दिया। पटवारी के राहुल गांधी के कोर गु्रप में होने के कारण उनके विभाग को लेकर दोबारा विचार-विमर्श किया जा रहा है। पटवारी अपनी पसंद पर अड़े हुए हैं।


3. तुलसी सिलावट: सिंधिया समर्थक सिलावट ने सीएम को कहा है कि उनका सम्मान बरकरार रहना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो उन्हें मंत्री नहीं बनना, वे सिंधिया के साथ ही काम करेंगे। इस पर मामला उलझ गया है, क्योंकि सिंधिया खेमा मानता है कि सिलावट का नाम डिप्टी सीएम के लिए था, लेकिन अब मंत्री बनाकर गलत हुआ है।


4. विजय लक्ष्मी साधौ: पूर्व सांसद के बाद अब दोबारा मंत्री बनी विजयलक्ष्मी साधौ राजनीतिक कद के हिसाब से विभाग चाहती हैं। वे चिकित्सा शिक्षा विभाग पर अड़ी हैं। फिलहाल उन्हें यह विभाग नहीं दिया जा रहा था, लेकिन अब साधौ के अडऩे के कारण स्थिति उलझ गई है। अनुभवी होने के नाते साधौ की मांग पर मंथन किया जा रहा है।


5. इमरती देवी: सिंधिया समर्थक मंत्री इमरती देवी ने भी महिला एवं बाल विकास विभाग मांगकर बंटवारा उलझा दिया है। सूत्रों के मुताबिक इमरती ने सिंधिया तक गुहार लगाई है। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि उन्हें महिला बाल विकास के अलावा दूसरा विभाग नहीं चाहिए। इसे लेकर अब विचार-विमर्श का दौर है।




इधर, पहली कैबिनेट में बिजली आपूर्ति को लेकर अफसरों की खिंचाई... 
वहीं दूसरी ओर कांगेस सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में बुधवार को बिजली व्यवस्था पर मंथन किया गया। विभाग के प्रमुख सचिव आइसीपी केसरी ने बताया कि गांवों में 10 घंटे बिजली देते हैं, यह बहुत है।


इस पर मंत्री सचिन यादव बिफर गए। बोले, क्या कभी खेत में गए हो। यहां एसी में बैठकर कैसे बताते हो कि गांव के लिए 10 घंटे बिजली बहुत है। गांवों में बिजली नहीं मिल रही और आप पर्याप्त आपूर्ति बता रहे हैं। इसके बाद तरुण भनोत, इमरती देवी सहित अन्य मंत्री भी अफसरों पर बरस पड़े।



प्रेजेन्टेशन में पीएस केसरी ने जैसे ही बिजली आपूर्ति 13500 मेगावाट बताई तो मंत्री इमरती देवी ने कहा, मेगावाट से क्या समझ में आएगा। इस पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि आंकड़े बताने की बजाए ये बताओ कि कितने घंटे बिजली दी जा रही है। मंत्री भनोत ने कहा, प्रदेश बिजली में सरप्लस स्टेट था, अब कटौती करने लगे।


इससे लोगों में गलत संदेश जा रहा है कि कांग्रेस सरकार आई तो कटौती होने लगी है। जवाब में केसरी ने मेंटेनेंस चलने का हवाला दिया तो भनोत बोले-ऐसे में क्या हमे लोकसभा चुनाव हरवाओगे? मई तक सारे मेंटेनेंस रोक देें। चुनाव के बाद करवाना।


बिजली समस्याओं के मुद्दे पर पीएस केसरी ने कहा कि 1298 हेल्पलाइन पर फोन लगाने से समस्या हल हो जाती है। इस पर कमलनाथ ने कहा कि तुरंत फोन लगाओ, देखते हैं हकीकत। मंत्री विजयलक्ष्मी साधौ ने नंबर डॉयल किया, लेकिन बात नहीं हो पाई। मंत्रियों ने पूछा कि पिछली सरकार ने निजी कंपनियों से बिना बिजली खरीदे अनुबंध के तहत कितनी राशि चुकाई है।


केसरी ने जवाब दिया कि अनुबंध ऐसा है कि बिजली खरीदना ही होगी और नहीं खरीदते तो भी निश्चित राशि देना जरूरी है। दो साल पहले 2400 करोड़ दिए थे। एक साल पहले 1500 और इस बार 1000 करोड़ रुपए दिए। इस पर कमलनाथ ने नाराज होकर कहा कि ऐसा ही करना था तो आदिवासी क्षेत्रों में बिजली फ्री दे देते।


संजय शुक्ल से पूछा- आप कौन हो...
कमलनाथ ने पॉवर मैनेजमेंट कंपनी के एमडी संजय शुक्ल से पूछा- आप कौन हो, शुक्ल बोले, पॉवर मैनेजमेंट कंपनी का एमडी हूं। जवाब सुनकर सीएम ने कहा, पीएस केसरी हैं तो आप क्यों? आपको आना है तो कंपनी के अफसरों को साथ लाना था। सात दिन बाद मैं फिर रिव्यू करूंगा।


पूर्व मंत्रियों के स्टॉफ को लेने पर पाबंदी
सीएम कमलनाथ ने मंत्रियों को हिदायत दी कि वे भाजपा सरकार के मंत्रियों के स्टाफ को पदस्थ न करें। सीएम ने कहा, जिसको पदस्थ करें, उसकी पूरी जानकारी ले लें। मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने पूर्व मंत्री संजय पाठक के पीए बसंत बाथरे को रख लिया है, हालांकि इनके अधिकृत आदेश नहीं निकले हैं।


नीरज मंडलोई के परिचय से चौंके मुख्यमंत्री
सर, मैं नीरज मंडलोई, प्रमुख सचिव माइनिंग और हायर एजुकेशन हूं। इतना सुनकर मुख्यमंत्री कमलनाथ थोड़ा चौंके और अचरज जताते हुए मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह से पूछा कि ये कैसा कॉम्बीनेशन है।


मुख्य सचिव ने उन्हें बताया कि मूलत: ये प्रमुख सचिव खनिज साधन हैं और उच्च शिक्षा का अतिरिक्त प्रभार दिया है। नया अधिकारी खोज रहे हैं। सीएम ने कहा पुरानी परंपराओं से अलग हटकर काम करना है। बदलाव के लिए लोगों ने हमें चुना है।


आज कृषि विभाग का प्रेजेन्टेशन... कैबिनेट के पहले दिन बिजली विभाग ने प्रेजेन्टेशन दिया, जबकि गुरुवार को कृषि विभाग ऋण माफी पर तैयारियों और अमल के प्रारूप पर प्रेजेन्टेशन देगा।


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