लूट नोच की शिक्षा नीति, संस्कृति पर, विराम बगैर असंभव है, प्रतिमा निर्माण-व्ही.एस.भुल्ले

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
विश्व की सबसे समृद्ध, शिक्षित, सुसंस्कृत, दिव्य, भव्य संस्कृति संस्कारों वाले इस महानतम भूभाग को इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य कि जिसकी गोद में अनादिकाल से आध्यात्म ही नहीं बड़े-बड़े चमत्कारिक व्यक्तित्व, विधायें अटखेलियां करती रही हो और जिन्होंने इसी महान भूभाग पर एक से बढ़कर एक कीर्तिमान स्थापित कर, पुरुषार्थ की पराकाष्ठा अपनी कृतज्ञता के बल पर सिद्ध की हो। और परिश्रम की  पराकाष्ठा गौड़ नजर आती हो। जो महान भूभाग कई मर्तबा समय के हाथों परास्त होने के बावजूद भी आज पूरे गौरव, वैभव, सामर्थ के साथ समुची दुनिया के सामने अपने भव्य, दिव्य रूप में खड़ा हो। और आज एक मर्तबा फिर से वह उसी कृतज्ञता, पुरुषार्थ सम्मान, स्वाभिमान के साथ अपनी कीर्ति विरासत को आगे ले जाने आतुर हो। ऐसे में प्रचलित आर्थिक नोच-तूप की शिक्षा और उससे निर्मित संस्कृति इस महान भूभाग पर कलंक ही नहीं एक ऐसे बदनुमा दाग के रूप में हमारे सामने हैं। जिसे मिटाने में कई वर्षो की तपस्या और कई पीढिय़ां लग जाए तो कोई अति संयोक्ति न होगी। जो हमारे समाज में किसी खतरनाक कैंसर से कमतर नहीं। शिक्षा के नाम पर गांव गली नगरों में सजी सत्ताओं के सरंक्षण में दुकाने, अर्थ, प्रतिभा, पुरुषार्थ को ही सरेयाम नहीं लूट रही। बल्कि उनकी भू्रण हत्या जैसा जघन्य अपराध भी करने से नहीं चूक रही।
जिससे न तो प्रतिभा निर्माण हो रहा हैं, और न ही वह अदभुत चमत्कारिक प्रतिभाओं का वह प्रदर्शन जिसके लिए हमारे महान भू-भाग को हजारों वर्षो से जाना-पहचाना जाता रहा है। न ही उन महान संस्कारो का निर्माण हो पा रहा है जो एक समृद्ध खुशहाल भूभाग निर्माण के लिए अहम होते है। जिसकी महान विरासत मे नस्ले ही नही कई पीढिय़ां स्वच्छंद जीवन निर्वहन कर पाती है। आज जब जिस भू-भाग की आधे से अधिक आबादी सस्ते राशन की मोहताज, करोड़ों माताऐं, बहिने, बच्चे, अल्परक्त, कुपोषण की शिकार और एक बड़ी आबादी शिक्षित होने के बावजूद बेरोजगार, 50 फीसद आबादी के पहुंच से शुद्ध पेयजल की दूरी और शिक्षा प्राप्त करने, शिक्षा के नाम लोगों के धन की नोच-तूप के पश्चात एक ऐसी नस्ल तैयार हो रहा हो, जो सिर्फ और सिर्फ पैसा बनाने की मशीन या बहुराष्ट्रीय मुनाफाखोर कम्पनियों के लिए बैजान मशीन बन, उनके लाभ के लिए संस्कार, संस्कृति को अपने बूटो-तले कुचल असंवेदनशीलता की सारी सीमाऐं लाधने तैयार है।
देखा जाए तो अपनी हाड़तोड़ मेहनत के हजारों, लाखों रुपये फूकने वाले उस वर्ग की उन नस्लों में कितनी संवेदनशीलता, संस्कार, सर्वकल्याण का भाव होगा जो नर्सरी से ही अच्छी शिक्षा ने नाम अपने पालक जन्मदाताओं को शिक्षा माफियाओं के हाथों लुटता पिटता या गांव में खेत तो नगर में अपना घर बिचता देखते है। ऐसे में हमें और हमारी सत्ता, दलों संगठन, संस्थाओं के लिए यह शोध का विषय होना चाहिए और नागरिकों में चर्चा का मुद्दा कि जो शिक्षा न तो इस महान भूभाग के हित में है न ही इस पर रहने वाले नागरिकों के हित मेंं। फिर वह प्रचलन में क्यों? क्या सबा अरब की भीड़ में ऐसे योग्य प्रशिक्षक, विद्यवान लोग नहीं, जो इस राष्ट्र और समाज की दिशा और दशा बदल सकते है। कभी भरी सभा में अपमानित एक महान शिक्षक आचार्य पं. विष्णु गुप्त चाड़क्य ने उस समय के अताताई अहंकारी सत्ता प्रमुख की सभा में उसकी आंखों में आंख डाल कहा था कि शिक्षक तुम्हारी भिक्षा या पुरुस्कार के मोहताज नहीं। जिस शिक्षक की गोद में प्रलय और विनाश खेलते हो, वह स्वयं अपने जीवोत्पार्जन की व्यवस्था कर लेगा। मगर ऐसे शिक्षक और शिक्षा तभी संभव है जब सत्ता, दल, संगठन, संस्थाओं को संचालित करने वाले लोग और इस राष्ट्र के नागरिक अपने निहित स्वार्थ छोड़ राष्ट्र हित में  सोचेगें।
जय स्वराज