गूूगल गुरु, नेट माता की गोद में खेलती युवा पीढ़ी :- व्ही.एस.भुल्ले

=सत्य से विमुख, सृजन संचालन, असम्भव=
-संरक्षको से संरक्षित सेवको का, सत्य, सृजन संस्कृति, संस्कारों से विमुख, आचरण, व्यवहार सहज स्वीकार्यता में बड़ी बाधा-

विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भारतवर्ष वह महान भू-भाग रहा है जहाँ मानव ही नहीं, पेड़, पौधे, वृक्ष, पशु-पक्षी, जानवर, नदी, तालाब, अग्नि, वायु अपने प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक गुणों के आधार पर अपनी सिद्धता, सृष्टि, सृजन और संचालन में सार्थकता सिद्ध करते आये है। जिनमें लोगों की अनादिकाल से आस्था भी रही है और विश्वास भी है। आज जब हम अर्थ, भावार्थ की चर्चा करते है। तब की स्थिति में हो सकता कि हमारी पीढ़ी इन अर्थ,भावार्थो से अनभिज्ञ होने के कारण इन्हें अर्थ पूर्ण उपयोगी न समझे। जिसके लिये उस पीढ़ी को उत्तरदायी ठहराना न्यायचित नहीं होगा। क्योंकि हमारा अपना ही विश्वास आस्था हमारी महान सनातन संस्कृति और आध्यात्म में नहीं रहा और हमने स्वयं ही हजारों वर्ष की गुलामी को झेलते हुए मजबूरन उस शिक्षा संस्कृति, संस्करों को अंगीकार कर लिया जो सृष्टि ही नहीं सृजन से भी विमुख रहे है और उसके परिणाम भी कभी सृष्टि सृजन के पक्ष में नहीं रहे, कभी-कभी यह सवाल उन चिंतन, मनन आध्यात्म मैं विश्वास रखने वालों के बीच अवश्य रहता होगा।
        आज जो विचार विभिन्न विषयों को लेकर मेरे मन में आते हैं। कहते हैं प्रकृति परिवर्तन का नियम है और सृष्टि, सृजन, सत्य। जबकि जीवन प्रकृति की गोद में संरक्षित रह, अपने जीवन चक्र  को स्वच्छंद रूप से पूर्ण करता है। उसकी प्रकृति अनुसार शिक्षा संस्कृति संस्कारों से दिव्य भव्य उपयोगी उत्तम बनता है समूची दुनिया में सनातन संस्कृति अनुकूल,जीवन ही स्वच्छंद, समृद्ध, खुशहाल जीवन का वह अंग है, जो जीवन ही नहीं सृष्टि के मूल कर्म सृजन में सहायक होता है। आज जब चर्चा एक मर्तबा पृथ्वी के उस महान भू भाग पर सरगर्म है। संरक्षक, संगठन, संस्थाओं को लेकर जिसके बारे में कहा जाता है कि उनकी गहरी आस्था सनातन संस्कृति और संस्कारों में है और वह जनकल्याण के लिए वृहत सोच ही नहीं आचरण व्यवहार भी रखते हैं। और प्रकृति अनुसार प्राप्त जीवन का उत्तम परिणाम मूलक उपयोग सृष्टि सृजन या राष्ट्र निर्माण में हो, ऐसा विचार रखते है। मगर ऐसी संस्था संगठनों से मुखर असहमति  ऐसे विचार का विरोध आखिर क्यों? जबकि मौजूद युवा पीढ़ी जीवन के गूढ़ रहस्य गूगल गुरु और नेट माता की शरण में अपना दिव्य भव्य स्वरूप बनाने उतावली हैं। कारण साफ है कि हम हमारी युवा पीढ़ी के साथ न्याय नहीं कर सके, हम उन्हें वह महान शिक्षा, संस्कृति से भी अवगत और उन महान संस्कारों का भी एहसास नहीं करा सके जिनकी गोद में सृजन विनाश दोनों खेलते हैं वह संरक्षक, संगठन, संस्था भी अपने कड़े परिश्रम, त्याग, तपस्या के बावजूद भी, ऐसे लोगों की जमात उस भू-भाग पर प्रमाणिकता के  साथ खड़ी नहीं कर सके। जिन पर गर्व कर हमारी युवा पीढ़ी स्वयं को गौरान्वित महसूस कर सके, न ही उनके अंदर वह आचरण व्यवहार पैदा कर सके जो सामाजिक आर्थिक संतुलन के साथ ऐसी सृजनात्मक कल्याणकारी सताए बना सके। जिनकी ख्याति ऐश्वर्य अनुकरणीय हो, अगर ज्ञान से इतर संसाधन सत्ताओं के संरक्षण में ही, सृजन कार्य पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से होता तो, भारतवर्ष का इतिहास, भू-भाग बहुत वृहत, दिव्य-भव्य रहा है जिसकी संस्कृति, अक्षुण और हजारों वर्ष बाद आज भी हमारे खून में विचार बनकर दौड़ती है। विभिन्न विषयों में हमारी आपसी सहमति-असहमति गुण दोष के आधार पर हो सकती है। मगर हमारी नैसर्गिक, प्राकृतिक, सृजन को समर्पित जवाबदेही उत्तरदायित्व अलग नहीं। मगर जन व राष्ट्र कल्याण के महान यज्ञ में हमें उस अहम, अहंकार और मध का होम करना होगा, जिनकी पहली शर्त ही प्रकृति, सृजन, विचार, विद्या-विद्ववान  के विरुद्ध होती है। और जो अनादिकाल से ही विनाश का कारण रहे है। बचना होगा हमें उस संस्कृति विरुद्ध उच्च कुलीन परिभाषा से जिसका सही अर्थ हम अपने ही सहजन, सज्जनों को समझने में असफल रहे, क्योंकि प्रकृति ने बगैर भेदभाव के सभी को सभी को सृष्टि में सृजन कार्य करने के लिए क्षमता अनुसार अपने कर्तव्य निर्वहन का मौका दिया है फिर वह पशु-पक्षी, जल, थल, नभचर सहित मानव ही क्यों न रहा हो। हमारा इतिहास, हमारे महान धर्मग्रंथ इस बात के गवाह है जिसने भी अपने पुरुषार्थ के बल पर अपने जीवन की उपयोगिता सिद्ध कर, अपनी सिद्धता, सृष्टि, सृजन में साबित की है। आज भी हजारों वर्ष बाद उनका नाम इस सृष्टि में सम्मानजनक रुप में लिया जाता है जिनके प्रति लोगों मैं आज भी आस्था, समर्पण और विश्वास का भाव है। फिर वह जलीय जीव पशु-पक्षी, जानवर मानव, वृक्ष, पौधे हो जिन्हें आज हम विभिन्न नामों से जानते हैं और पहचानते हैं इसीलिए जब तक हमारा आचरण व्यवहार हमारी संस्कृति अनुरूप सृष्टि, सृजन में योगदान और पूर्ण निष्ठा इमानदारी से अपने कर्तव्य निर्वहन करने वाला नहीं होगा, तब तक इसी तरह अर्थ का अनर्थ कर, हम विनाश की विभिषिका की ओर अनवरत बढ़ते रहेंगे और अपने सुंदर, समृद्ध, खुशहाल, जीवन को कष्ट प्रद सघर्ष पूर्ण बना, उसे अर्थहीन बनाते रहेंगे।
जय स्वराज