केरल की बाढ़ में धुल गई दिलों की गर्द, धर्म भेदभाव भूल कर रहे एक-दूसरे की मदद

 मंथन न्यूज दिल्ली
केरल की बाढ़ में वहां के लोगों के दिलों में एक-दूसरे खिलाफ जमी गर्द भी बह गई। धर्म-जाति, सामाजिक, आर्थिक भेदभाव को भूलकर लोग खुले दिल से एक-दूसरे की मदद करते दिखे। कहीं मुस्लिम युवा मंदिरों में जमी गाद की सफाई करते दिखे, तो आरएसएस के स्वयंसेवकों ने गिरिजाघरों की सफाई की। जिससे जो भी बन पड़ा, एक दूसरे की मदद में कोई कमी नहीं छेड़ी।

तिरुवनंतपुरम में आरएसएस के अनुसांगिक संगठन सेवा भारती से जुड़े वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट रंजीत कार्तिकेयन कहते हैं कि इस विभीषिका से जूझने में पूरा केरल एकजुट है। उन्होंने बताया कि किस तरह त्रिवेंद्रम के पास ही एक जामा मस्जिद ने बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए सामान इकट्ठा किया और उसे सेवा भारती को जरूरतमंदों के बीच वितरित करने के लिए दे दिया।
सेवा भारती पर भले ही हिंदुत्व का आरोप लगता रहा हो, लेकिन राहत व बचाव कार्य में उसने कोई भेदभाव नहीं किया। सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने जब उत्तरी परावूर के सेंट सेबैस्टियन चर्च की हालत देखी तो आरएसएस के स्वयंसेवकों ने उसे साफ-सुथरा कर प्रार्थना के लायक बनाने का जिम्मा उठा लिया।

वहीं मन्नरकाड के अयप्पा मंदिर की सफाई की जिम्मेदारी मुस्लिम छात्रों ने ली। मुस्लिम छात्रों के संगठन विकाया से जुड़े कार्यकर्ता पूरी तैयारी के साथ मंदिर की साफ-सफाई में जुटे और सारी गाद निकालने के साथ-साथ दीवारों को भी साफ-सुथरा किया। मंदिर की सफाई में जुटे इन छात्रों की तस्वीरें सोशल मीडिया में भी वायरल हुईं

बाढ़ प्रभावित इलाकों के सभी राहत शिविरों का भी यही हाल था। इन शिविरों में एक-दूसरे के साथ धार्मिक, जातिगत या सामाजिक भेदभाव का नामोनिशान तक नहीं था।बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित पांडनार में ईसाई मैथ्यू की घर की सफाई में सेवा भारती के स्वयंसेवक जुटे थे।

27 सालों तक यूएई में नौकरी करने के बाद पत्नी और मां के साथ पांडनार में रहने वाले 70 वर्षीय मैथ्यू कहते हैं कि तीन दिन तक वे घर की पहली मंजिल पर बिना खाए पीए पड़े थे। इसके बाद सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने उन्हें बचाया। मैथ्यू के तीनों बच्चे बाहर नौकरी करते हैं। मैथ्यू ने कहा कि जिंदगी के अंतिम समय में उन्हें इसका अहसास हुआ कि धर्म के आधार पर नाहक ही लोग एक-दूसरे से नफरत करते हैं। सबसे बड़ा धर्म मानवता है।