*(आधुनिकता के प्रभाव में यूं ना मरने दे मातृभाषा हिन्दी को - कलेक्टर ओम प्रकाश श्रीवास्तव*

*(आधुनिकता के प्रभाव में यूं ना मरने दे मातृभाषा हिंदी को  कलेक्टर ओम प्रकाश श्रीवास्तव*

*(हिंदी पर चौतरफा बात आई आक्रमण पूरे हैं कंप्यूटर मोबाइल के प्रति प्रयोग से बड़ी चुनौती लेपन तरक्की मिली है वही लापरवाही भूल के कारण भाषा के वैज्ञानिक स्वरूप को नष्ट कर तेजा रहे हैं इससे भाषा  मैं कई अशुद्धियां आ गए हैं*

भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाते हैं जो संस्कृति जितनी उन्नत होती है उसकी भाषा उसका शब्दकोश भी उतना ही उन्नत होता है किसी राष्ट्र की भाषा की दशा देखकर बताया जा सकता है कि उस कालखंड में वह राष्ट्र उन्नत रहा होगा या नहीं!
भाषा के द्वारा विचार संप्रेषण के दो माध्यम है प्रथम ध्वनि बारा अर्थात भूलकर और दूसरा लिपि द्वारा अर्थात लिखकर भाषावाद क्यों के रूप में बोली जाती है और बाकी सब तो मैं तो शब्द मूल ध्वनियां से मिलकर बनते हैं और उनका सार्थक अर्थ होता है भाषा को लिखते हैं तो प्रतिकूल ध्वनि के लिए एक चेन ने होता है जैसे वन कहते हैं वंस रूप में लिखें जाते हैं उसे लिपि कहते हैं धनी वह लिपि वह वाहन है, परंतु वर्णसंकरत्व से भाषा की जीवंतता समाप्त हो जाती है, आत्मा मर जाती है लोग सोशल मीडिया पर हिंदी को रोमन लिपि में लिखते हैं हिंदी की लिपि देवनगरी है! देवनगरी ध्वन्सवयात्मक है! अर्थात जैसा उच्चारण हूं इस लिपि में उसे ठीक वैसा ही लिखा जाता है यदि शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं तो उसे देवनगरी मैं गलत लिख ही नहीं सकते इसलिए देवनगरी में हिंदी भाषा लिखने के लिए  हिच्चे (स्पेलिंग) सीखने की जरूरत नहीं होती! यह सुविधा रोमन सहित अन्य लिपि हूं मैं नहीं है उदाहरण के लिए देवनगरी लिपि में उच्चारण के अनुसार योग लिखा जाएगा! गोविंदा ऐसे लिखने का अन्य कोई तरीका हुई नहीं सकता जबकि रोमन लिपि में जो गौर योगा लिखा जा सकता है दोनों का उच्चारण योग होगा और दूसरे को योगा भी कहा जा सकता है रोमन लिपि अंग्रेजी शब्दों के लिए रूढ  है, अर्थात परंपरा से यह तय है कि किस शब्द की स्पेलिंग क्या होगी बल्ले उच्चारण कुछ भी हो इसलिए to को तू और go को गो बोलते हैं रोमन में लिखने में हिंदी के उच्चारण में रहता आ रही है इसीलिए योर को योगा बोलना आधुनिकता हूं गया है हिंदी को अन्न चुनौती लिप्यातरण से मिल रही है!  इसमें हिंदी को रोमन लिपि में लिखते हैं और देवनगरी लिपि में लिखी अनेक सामान शब्द सामने आ जाते हैं इनमें से सही शब्द चैन कर लेते हैं हम हिंदी को रोमन लिखी में लिखकर भाषा के साथ अन्याय तू कर ही रहे हैं साथी अपना समय भी नष्ट कर रहे हैं क्योंकि रोमन में हिंदी लिखने में सामान से दो गुना अधिक समय लगता है इसी यूपी के सकते हैं कि देवनागरी लिपि में हिंदी को लिखना आधा समय लेता है इसमें लिपि वाह भाषा का नैसर्गिक तारतम्य खूनी से शब्द प्रभाती होता है और हम विचारों को अच्छे से व्यक्त कर पाते हैं रोमन लिखी में लिखने का कारण समानता यह बताया जाता है कि देवनगरी को टाइप करना कठिन है यह भूत भ्रामक है मात्र 3 दिनों की प्रयास से कोई भी देवनगरी की टाइपिंग सीख सकता है यदि हम रोमन में या लिप्ंयातरण के माध्यम से प्रतिदिन 30 मिनट हिंदी लिखें तो इसे ही हम देवनगरी की टाइपिंग सीख कर 15 मिनट में कर सकते हैं यदि वुमन में लिखकर हम 15 मिनट प्रतिदिन व्यर्थ करते हैं तो एक माह में 7.5 घंटा या एक कार्यकारी दिवस बर्बाद करते हैं 25 वर्ष के सक्रिय काल में यह बर्बादी 300 कार्यकारी दिवस की होती है जबकि मात्र 3 दिन में देवनगरी टाइपिंग सीख कर अपने समय की बचत कर सकते हैं और भाषा और लिपि का संरक्षण कर सकते हैं हिंदी की दूसरी चुनौती हमारी लापरवाही है जिसकी कारण वर्तमान में प्रचलित हिंदी में अनेक अशुद्धियां आ गए हैं इसके लिए मुख्य रूप से हिंदी के समाचार पत्र और पत्रिकाएं (कुछ अपवाद छोड़कर) जिम्मेदार है जो अपनी लापरवाही याद छोटी सी सहूलियत के लिए अनुस्वार(.) पंचमाक्षरो (ड,ञ, ण, न, म) के अर्ध रुके स्थान पर बिंदी(.) चंद्रबिंदु(ँ) मैं अंतर नहीं करते भी चंद्रमुखी के स्थान पर भी बिंदी का प्रयोग करते हैं और इन तीनों में घालमेल कर देते हैं ऐसे हिंदी की देवनगरी लिपि का धनात्मक जैसे बोला जाता है ठीक वैसा ही लिखा जाता है सरुप नष्ट हो जाता है देवनगरी वर्णमाला मैं 11 स्वर व 33 व्यंजन है इसमें अं और अः स्वर नहीं है! बेशर्म के साथ प्रेत होने वाली तो विशेष धनिया है जिन्हें क्रमशः अनुस्वार और विमर्श कहते हैं अनुस्वार वर्णमाला के अंतिम 8  व्यंजन (य, र, ल, व, श, ष, स, ह) के पूर्व आते हैं!  जैसे अंस, वंश आदि! ड, ञ, ण, न तथा म प्रत्येक वर्ग ( क्रमशः क, वर्ग च वर्ग,ट वर्ग त वर्ग प वर्ग) कि पाँचवे अक्षर हैं और इन्हें पंचमाक्षर कहते हैं! यदि शब्द में इन पांचों मैं से कोई भी अदर्स धरती रूप में आता है तो उसे बिंदु बे रूप में लगा देते हैं यह बिंदु अनुस्वार की बिंदी की तरह ही होती है इसका नियम है है कि शब्दों में शुरू बिंदु के बाद जिस बरगद का बनाता है शुरू बिंदु उसी वक्त के अर्द्ध पंच माचर को व्यक्त करता है उधारण के लिए गंगा( गड्गा) में   सिर बिन्दु ड् को व्यक्त करता है! एसी प्रकार चंचल (चञक्षल) में ञ को दंड (दण्ड) ण् को अंत (अन्त) में न् और (पंपा) में म् को व्यक्त करता है  यह नियम अंततः वैज्ञानिक है और उच्चारण की शुदा की बेटी से बनाया गया है पंचमार्क शत-शत ने ही वर्ग की व्यंजन से पुराने पर सरलता से उचित हो सकते हैं चंद्रमुखी अनुनासिक ध्वनि है! परंतु इसका उच्चारण पंचम वर्ग से कम है मॉ के उच्चारण में मां के बाद की ध्वनि साधारण पंचमाक्षर की चौथाई है इसे मॉ लिख देंगे तो उसका उच्चारण बदल जाएगा  और जिस ध्वनी से हम माता को पुकारते हैं लुप्त हो जाएगी इसी प्रकार गाँठ को गांठ लिखने पर उसका उच्चारण गाण्ठ हो जाएगा और कांट चांद को चांद लिखने से उसे चांन्द  उच्चारित करना पड़ेगा! यदि मॉ और मां का एक उच्चारण करेंगे तो इसका अर्थ होगा कि हमने अपनी लिपि की धनात्मक वैज्ञानिकता  नष्ट कर दी है
हिंदी आज चौतरफा भाषाई आक्रमण का सामना कर रही है हिंदी के लव बस सभी समाचार पत्रों में अनुनासिक ध्वनि चंद्र बिंदु का प्रयोग बंद कर दिया है कंप्यूटर पर देवनगरी का स्थान रोमन लिपि प्ले रही है हम जरा सी लापरवाही या भूल के कारण, अपनी भाषा के वैज्ञानिक स्वरूप को नष्ट करते जा रहे हैं लिप्ंयातरण  का विकल्प हिंदी की जड़ों में मट्टा डाल रहा है ध्यान रहे बातें तू हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध पति आज भी सार्थक है इज भाषा उन्नति हे सब उन्नति को मूल हमें अपनी सब बता संस्कृति को बचाना है तो सबसे पहली मातृभाषा को बचाना होगा और यह थोड़ी सी सावधानी से सी हो सकता है

विचार लेखन
ओम प्रकाश श्रीवास्तव
लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी वर्तमान में कलेक्टर मंदसौर