मध्य प्रदेश में सवर्णों का गुस्सा राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी!

सपाक्स सरकार बनाने या गिराने की निर्णायक भूमिका में इस चुनाव में तो नहीं होगी, लेकिन राजनीतिक दलों के कान उमेठने की स्थिति में तो जरूर है

मध्य प्रदेश में सवर्णों का गुस्सा राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी!

मध्य प्रदेश में यूं तो द्वि-दलीय राजनीतिक व्यवस्था है, कांग्रेस और बीजेपी. जो तीसरा दल कभी सीमावर्ती इलाकों में सिर उठा भी पाया, तो बहुत कमजोर तरीके से, लेकिन इस बार तस्वीर बदली है. इस बार गैर राजनीतिक संगठन सपाक्स ने तेजी से अपने पैर पसारे हैं.

सवर्ण बनाम दलित की लड़ाई से उपजा यह सरकारी कर्मचारियों का संगठन न केवल राजनीतिक दल का, बल्कि कुछ जगह सामाजिक आंदोलन की शक्ल लेता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि आजादी के आंदोलन की तरह इनकी गतिविधियां चोरी-छिपे हो रही हैं, बल्कि ये दिलेरी से हर शहर में मीटिंग कर रहे हैं.

सबसे ज्यादा इनसे युवा जुड़ रहे हैं, वे युवा जो भले ही अपनी कमजोरी के कारण प्रतियोगी परीक्षा नहीं पास कर पाते लेकिन उसकी जाहिरा वजह आरक्षण को मानते हैं. ये ठीक है सपाक्स सरकार बनाने या गिराने की निर्णायक भूमिका में इस चुनाव में तो नहीं होगी, लेकिन राजनीतिक दलों के कान उमेठने की स्थिति में तो जरूर है.

राजनेता भरी सभाओं में झेल रहे हैं सवर्णों का गुस्सा

बीते कुछ दिनों में कांग्रेस नेता कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर दिग्विजय सिंह तक इन सवर्णों का सार्वजनिक गुस्सा झेल चुके हैं. बीजेपी रविवार को सीधी में हुई घटना के लिए भले ही कांग्रेस को निशाने पर ले रही है लेकिन उसके पीछे भी सवर्णों का ही हाथ बताया जा रहा है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के रथ में तब हमला करना जब वे खुद उस रथ में बैठे में हो, ये बताता है कि आरक्षण के खिलाफ गुस्सा दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है

कांग्रेस और बीजेपी चोरी छिपे तो सपाक्स के नेताओं से मिलते और बात करते हैं, लेकिन जाहिर तौर पर उन्हें अपना साथी कहने से बचते हैं. वजह भी है कि मध्य प्रदेश में सवर्णों का वोट बैंक बहुत छोटा है. सबसे ज्यादा 50 फीसदी से अधिक वोटर ओबीसी हैं, उसके बाद एसटी और फिर एससी. सबसे आखिर में नंबर सवर्णों का आता है.

दोनों राजनीतिक दल इसी कारण इस गुस्से को अनदेखा कर रहे हैं, लेकिन आशंका ये है कि कुछ महीने पहले दलित बनाम सवर्णों का हिंसक प्रदर्शन देख चुके मध्य प्रदेश में आने वाले दिनों में कहीं गुटीय संघर्ष और न भड़के.