तात तुम तो प्रतिज्ञा बस सिंहासन से बंधे थे......... मगर लोकतंत्र के मंदिर में उन मूड़धन्यों को क्या हुआ जो काले कानून पर चुप रहे और सिंहासन के लिए भाई से भाई को लड़ाने वाला कानून ले आए व्ही.एस.भुल्ले

मंथन न्यूज शिवपुरी ।
अगर हमने हमारे महाकाव्य, महान ग्रंथ गीता से सबक लिया होता, तो आज भगवान राम, कृष्ण के इस महान भूभाग पर उन महान वंशजों की सन्तानों के बीच एक मर्तवा सिंहासन के लिए महाभारत जैसा नजारा न बना होता। उस समय तो स्वयं भगवान कृष्ण इस पवित्र भूमि पर मौजूद और उस महाभारत के साक्षी थे तथा प्रतिज्ञा बस सिंहासन से बंधे भीष्मपितामह सहित आचार्य द्रोणाचार्य,विद्धुर जैसे विद्ववान उस सभा में मौजूद थे। मगर पुत्र मोह से बंधे एक पिता ने राष्ट्र के राजधर्म का पालन न करते हुए सत्य को भरी सभा में अपमानित होने दिया और न्याय को निहित स्वार्थ अहम,अहंकार के चलते लज्जित होना पड़ा। जिसकी रक्षा के लिए स्वयं प्रभु कृष्ण को पहल करनी पड़ी।
आज एक मर्तवा फिर से हमारे महान लोकतंत्र के मंदिर में, न्याय, सिंहासन के संघर्ष में, फिर से लज्जित हो, वह स्वाभिमान, मान-सम्मान, अपमानित हुआ है। जिसका परिणाम कि संघर्ष गांंव-गली से शुरु होकर व्यक्ति, परिवार, समाज ही नहीं, नगर, शहरों तक आ पहुंचा है।
जिस समय लोकतंत्र के मंदिर में सत्ता के सिंहासन के लिए काले कानून की पटकथा लिख उसे अमली-जामा पहनाया जा रहा था। उस समय राष्ट्र, के तात बने संगठन से जुड़े लोग भी सदन में थे और सम्राट और उनके विधा-विद्ववान मंत्रियों के साथ उनके अहम सलाहकार भी मौजूद थे। मौजूद तो वह भी थे जो सिंहासन से जुड़े रहने या सत्ता में काबिज होने तत्पर बैठे है। जिनका कर्म ही नहीं, धर्म था कि जिस न्यायालय की व्यवस्था, प्राकृतिक न्याय व्यवस्था को पलटे जाने से उस महान भूभाग और इस भूभाग पर रहने वाले व्यक्ति, परिवार, समाज पर कितना बड़ा अन्याय का कुठाराघात होने वाला है। उस पर वह अपना पक्ष रखते। जो न्याय के सिद्धान्त विरुद्ध ही नहीं, उस महान संविधान की मंशा के विरुद्ध भी होगा। जो अपने हर नागरिकों को न्याय पाने का पूर्ण अधिकार देता है। इसी अधिकार पर हुए कुठाराघात से विचलित लोग आज सड़कों पर है और उन सत्ताओं व सत्ता पाने लालाहित लोगों पर सवाल खड़े करने से नहीं चूक रहे। जिन्होंने सत्ता स्वार्थ के आगे व्यक्ति, परिवार, समाज ही नहीं, समूचे राष्ट्र की ही अस्मियता को ही दांव लगा दिया। शर्म की बात तो उन महान संगठनों को भी है जो स्वयं को इस महान लोकतंत्र में संरक्षक की भूमिका में देखते हुए पाते है। आखिर वह संगठन किस मोह बस ऐसी सत्ता और सरकारों को संरक्षण देने मजबूर है। जिनकी भूमिका भीष्मपितामह तात श्री के रुप में हो सकती है। क्यों वह कुछ न पाने, न मिलने की अपेक्षा के साथ वर्षो से संघर्ष कर इस भूमिका में पहुंचे कि वह इस महान राष्ट्र के संरक्षक कहलाये। जिनके पास सिवाए विचार परिश्रम के अलावा न आगे कुछ है, न पीछे कुछ। फिर ऐसी मोह ममता ऐसी सत्ता सरकारों से क्यों। जिन्होंने आज जाति, वर्ग के नाम पर इस महान राष्ट्र को अन्याय के ऐसे मुहाने पर ला खड़ा किया है। जहां एक भाई दूसरे भाई से मनभेद रख, वेवजह के संघर्ष के लिए उतावला दिखता है। देखा जाये तो यह अन्याय पूर्ण कदम न तो इस महान राष्ट्र, न ही समाज, परिवार, व्यक्तियों का भला कर सकता है और न ही ऐसी सत्ता, संगठनों को पोषित कर उन्हें सिंहासन दिला सकता है। जो अपनी अक्षमताओं छिपाने झूठ को सबसे बड़ा अस्त्र मान देश की महान जनता को मूर्ख समझते है।
समझना होगा ऐसे लोगों को कि इतिहास और इतिहास में दर्ज ऐसी कई घटनायें साक्षी है। जब इस देश की महान जनता ने निहित स्वार्थ अहम अहंकार में डूबी सत्ताओं को निस्तानाबूत कर, उनका अस्तित्व भी खत्म कर दिया। फिर वह विदेशी आक्रान्ता, राजा, रजवाड़े या लोकतंत्र में मजबूत सत्ता नेता रहे हो। ये सही है कि इस महान राष्ट्र की जनता भोली-भाली है तथा संसाधनों के अभाव में वैवस, मजबूर। मगर इतनी भी मूर्ख नहीं कि उनके सामने भाड़े के भोपुओं के शोर और झूठ बोलने की पराकाष्ठा को वह न समझ पाये और न्याय-अन्याय में अंतर न कर पाये। इसलिए समझने वाली बात यहीं है कि इस देश की बैवस जनता की मजबूरी का लाभ उठा उसे वेफकूफ, मूर्ख न समझा जाये और न ही उसके मान-सम्मान, स्वाभिमान से सत्ता की खातिर खेला जाये। बरना परिणाम और इतिहास इस महान राष्ट्र के समझने साक्षी है।