सरकारी योजनाएं कभी हिट, कभी अनफिट

भोपाल. सरकारी योजनाएं चुनावी रण में कभी मास्टर स्ट्रोक तो कभी गलफांस साबित हुई हैं। दिग्विजय सरकार के दो और शिवराज सरकार के तीनों कार्यकाल में योजनाओं का असर साफ दिखता है। दिग्विजय सरकार ने 2002 में प्रमोशन में आरक्षण लागू किया। इससे कर्मचारी वर्ग नाराज हुआ तो 2003 में कांग्रेस को बड़ा झटका दे दिया। दूसरी ओर शिवराज सरकार की लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री कन्यादान, तीर्थ दर्शन, मुख्यमंत्री स्वरोजगार जैसी योजनाओं ने वोटरों का भरोसा जीता। अब चौथी बार सत्ता में आने का सपना देख रही भाजपा प्रदेश सरकार की भावांतर, संबल और बिजली बिल माफी योजना से वोटरों को लुभाने के जतन कर रही है। दूसरी ओर आरक्षण के मामले पर सवर्ण समाज काफी नाराज भी है। 
- ऐसे होते रही वोटरों को लुभाने की कोशिश
लाड़ली लक्ष्मी : 2008 के चुनाव के लिए 2007 में लाड़ली लक्ष्मी योजना शिवराज लाए। इसे केंद्र ने भी अपनाया। इसमें सरकार बालिका के लिए 1.18 लाख रुपए की राशि सुरक्षित रख देती है।
कन्यादान : शिवराज ने ये योजना भी 2008 के लिए 2006 में लागू की। इसे दूसरे राज्यों ने भी अपनाया। सरकार पहले 6500 रुपए विवाह के लिए देती थी। अब 10 हजार कर दी है।
तीर्थ दर्शन : वर्ष 2012 में शुरू हुई इस योजना के तहत सरकार 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों को तीर्थ दर्शन कराती थी। यह योजना भी बेहद असरदार रही।
मुख्यमंत्री स्वरोजगार : इस योजना के तहत युवाओं को रोजगार के लिए कर्ज दिया जाता है। यह असरदार रही। बाद में इस योजना का विस्तार भी किया गया।
लोकसेवा गारंटी : आम आदमी से जुड़ी सेवाओं को गारंटी के दायरे में लाया गया। 2010 में इसका अधिनियम लाए और 2012 से क्रियान्वयन शुरू कर दिया गया। ये योजना प्रभावी रही। 
एक रुपए गेहूं : प्रदेश सरकार 2008 में सीएम अन्नपूर्णा योजना लाई थी, लेकिन जून 2013 में इसमें एक रुपए किलो में गेहूं देने का बड़ा कदम उठाया। इसका असर 5.50 करोड़ आबादी पर पड़ा।
भावांतर योजना : 2018 के चुनाव के मद्देनजर किसानों की नाराजगी दूर करने फसल लागत व बाजार कीमत के बीच का अंतर चुकाने यह योजना शुरू हुई। मंदसौर किसान आंदोलन में गोलीकांड के बाद किसानों की नाराजगी बढ़ गई। बिचौलियों के दांव-पेंच भी योजना पर भारी पड़े।
संबल योजना : तीन कार्यकाल की एंटी-इंकमबेंसी को कंट्रोल करने मास्टर स्ट्रोक की तरह सरकार ने यह योजना लॉन्च की। इसमें 2.27 करोड़ मजदूर रजिस्टर्ड हो गए। अब सवर्ण समाज का गुस्सा इसे बेअसर कर रहा है।
बिजली बिल माफी : संबल योजना के साथ ही सरकार ने इसे भी तुरुप के पत्ते की तरह चला। 200 रुपए फ्लैट रेट पर बिजली दी। बकायादारों के 4-4 लाख तक माफ किए। सवर्ण समाज की नाराजगी भारी पड़ रही है।


- उमा व गौर के ऐसे थे दांव 
उमा भारती 2003 में जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर पर केंद्रित 'पंचजÓ अभियान लाई थीं। उनके जाने के बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई। अगस्त 2004 में मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर आए तो गोकुल ग्राम योजना लाए, लेकिन, नवंबर 2005 में उनके जाने के बाद ये भी भुला दी गई।
- दिग्विजय काल में ऐसे दांव 
दिग्विजय सिंह की सरकार में दलित एजेंडा लागू किया गया था। 2002 में प्रमोशन में आरक्षण लागू किया। 2003 में कर्मचारी वर्ग की नाराजगी, बिजली-सड़क की परेशानी और भाजपा के कैम्पेन ने दिग्विजय सरकार के सभी प्रयास धराशायी कर दिए।


भाजपा सरकार ने हर वर्ग का ध्यान रखा है। इनसे प्रदेश में आम आदमी का जीवन आसान हुआ। ऐसा कभी कांग्रेस के समय नहीं हुआ।
- राकेश सिंह, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा


भाजपा सरकार योजनाओं पर अमल नहीं करती। योजनाएं केवल सब्जबाग दिखाने के लिए हैं। कोई ऐसी योजना नहीं, जिसमें घोटाले न हों।
- कमलनाथ, अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस