कमलनाथ के गढ़ में सेंध लगाने में जुटी भाजपा

छिंदवाड़ा. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा जिले में कांग्रेस और भाजपा दोनों की राह आसान नहीं है। यहां के सात विधानसभा क्षेत्रों में से चार पर भाजपा और तीन पर कांग्रेस का कब्जा है। 2008 में भी यही स्थिति थी। विधानसभा चुनाव 2003 की बात करें तो आठ विधानसभा क्षेत्र में से भाजपा के पास सात और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के पास एक था। गौरतलब है कि 2008 में परिसीमन के बाद जिले में सात विधानसभा क्षेत्र रह गए हैं। कमलनाथ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से क्षेत्र के कार्यकर्ता चुनाव को लेकर काफी उत्साहित हैं। वहीं, भाजपा कमलनाथ को उन्हीं के क्षेत्र में घेरने की रणनीति से काम कर रही है।


मुख्यमंत्री ने लिया जिले में आशीर्वाद
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भी इस जिले पर नजर है। उन्होंने जनआशीर्वाद यात्रा के माध्यम से छह विधानसभा क्षेत्र कवर किए हैं। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह मतदाताओं का मूड जानने के लिए कार्यकर्ताओं के संपर्क में हैं। जिले के स्थानीय मुद्दे और गुटबाजी भाजपा-कांग्रेस दोनों को चुनौती दे रहे हैं। महंगाई, पेयजल संकट, बंद होती कोयला खदानें, उच्च शिक्षा, अवैध खनन, पर्यटन और उद्योग धंधों की कमी राजनीतिक गणित पर भारी पड़ रहे हैं। एससी-एसटी एक्ट के मामले में कई समाज के लोग नाराज हैं।


जिले के बड़े मुद्दे
पेयजल संकट : मचागोरा बांध बनने के बाद भी पेयजल संकट सबसे बड़ा मुद्दा है। जिला मुख्यालय में एक दिन के अंतराल में पानी की सप्लाई की जा रही है। परासिया विधानसभा क्षेत्र में कई जगह तो १५-१५ दिन के अंतराल से जलापूर्ति की जा रही है।



कोयला खदानें : परासिया और जुन्नारदेव में कई कोयला खदानें बंद होने से बेरोजगारी बढ़ी है। हालांकि, मुख्यमंत्री के जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान केंद्रीय कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने छह नई खदानें खोलने की घोषणा की है।



उच्च शिक्षा : उच्च शिक्षा के लिए जिले में लंबे समय से कॉलेज और विश्वविद्यालय की मांग हो रही है। जिले में एग्रीकल्चर और इंजीनियरिंग कॉलेज की जरूरत है। यहां के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ रहा है।



उद्योग धंधे : मक्का और संतरा का बड़े पैमाने उत्पादन होता है, लेकिन कृषि आधारित कोई बड़ा उद्योग नहीं होने के कारण कच्चा माल दूसरे जिलों या प्रदेशों को भेजना पड़ता है। लोगों को न रोजगार मिल रहा है, न फसल के सही दाम।