नई सरकार के पाले में ही रहेगी पदोन्नति में आरक्षण मामले की गेंद

भोपाल - पदोन्नति में आरक्षण का मसला मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार ही नहीं, आने वाली सरकार के लिए भी समस्या बनेगा। दरअसल, जबलपुर हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से दायर एसएलपी पर सुनवाई के लिए अभी तक पीठ का गठन ही नहीं हुआ है, जबकि प्रदेश में चुनाव आचार संहिता कभी भी लग सकती है। ऐसे में फैसला आता भी है तो आचार संहिता प्रभावी होने से सरकार अपने स्तर पर निर्णय नहीं ले पाएगी

आरक्षित वर्ग का कर्मचारी संगठन अजाक्स (अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ) चुनाव से पहले पदोन्नति में आरक्षण मसले पर पत्ते खोलने के लिए सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं। आरक्षित वर्ग के वोट बैंक की खातिर सरकार ने ये दांव खेला था, लेकिन यह अब उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। आरक्षित वर्ग सरकार से खासा नाराज है।
इस वर्ग के संगठन की मांग है कि एम. नागराज मामले में संविधान पीठ का फैसला आने के बाद स्थिति साफ हो गई है, अब सरकार को जल्द फैसला लेना चाहिए। उधर, सरकार एसएलपी पर फैसला आने और कोर्ट के फैसले के अधीन पदोन्नति देने लगाई गई अर्जी पर निर्णय का इंतजार कर रही है। जब तक कोर्ट सहमत नहीं होती है, सरकार सशर्त पदोन्नति भी नहीं दे सकती है।

सरकार के पास निर्णय लेने के लिए नहीं बचा समय
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जस्टिस रंजन गोगोई मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। अब पदोन्नति में आरक्षण को लेकर दो साल पहले दिए गए जबलपुर हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी पर सुनवाई के लिए पीठ का गठन होगा। इसके बाद मामले में सुनवाई शुरू होगी और प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इसी हफ्ते में आचार संहिता प्रभावी होने की उम्मीद है। इसलिए सरकार के पास इस मामले में कोई भी निर्णय लेने का समय नहीं बचा है। न तो सरकार संविधान पीठ के फैसले को आधार बनाकर पदोन्नति के नए नियम ला सकती है और न ही सशर्त पदोन्नति देने की अर्जी पर कोर्ट की सहमति के बगैर निर्णय ले सकती है। ऐसे में मामला अगली सरकार के पाले में ही जाना तय माना जा रहा है।

किसे साधें किसे नहीं
वर्तमान स्थिति में सरकार भी पशोपेश में है। आचार संहिता प्रभावी होने से पहले सरकार ने इस मामले में फैसला नहीं लिया तो आरक्षित वर्ग खिलाफ हो जाएगा जबकि इसके विपरीत सरकार ने कोई निर्णय लिया तो अनारक्षित वर्ग विरोध दर्ज कराएगा।

सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना
सपाक्य के अध्यक्ष केएस तोमर का कहना है कि वर्तमान में पदोन्नति में आरक्षण मामले में स्टेटस-को है। इसलिए सरकार एसएलपी पर फैसला आने तक कोई फैसला नहीं ले सकती है। यदि फिर भी कोई फैसला लेती है तो यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना होगी

राजनीतिक नुकसान होगा
वहीं अजाक्य के प्रवक्ता विजय शंकर श्रवण का मानना है कि सरकार से आश्वासन मिला है कि आचार संहिता प्रभावी होने से पहले कुछ न कुछ कर देंगे। पदोन्नति नियम 2002 प्रचलन में है। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो ये वादाखिलाफी होगी जिसका राजनीतिक नुकसान भी होगा।

भ्रम की स्थिति बनाकर रखेगी सरकार

पूर्व एडिशनल एडवोकेट जनरल अजय मिश्रा कहते हैं, पदोन्नति में आरक्षण मामले में संविधान पीठ स्पष्ट कर चुकी है कि एम. नागराज मामले में पुनर्विचार की जरूरत नहीं है। इसलिए अब सरकार के हाथ में कुछ नहीं रह गया है। सरकार दोनों तरफ से फंस गई है। अब मामले को लंबित रखने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। कोशिश यह रहेगी कि अब सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी लिस्टेड ही न हो। चुनाव तक सरकार की यही रणनीति अपनाएगी।