भोपाल। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कान्ता राव ने सभी जिलों को फरमान जारी किया है कि ईवीएम की सुरक्षा में किसी भी तरह की चूक के लिए कलेक्टर एवं एसपी सीधे तौर  पर जिम्मेदार होंगे। कांताराव सागर और खरगोन में ईवीएम मतदान के दो दिन बाद स्ट्रॉंग रूप में पहुंचने पर उठे सवालों का जवाब दे रहे थे। उन्होंने कहा कि देरी से आई ईवीएम को अलग-अलग रखवाया गया है। गड़बड़ी की जांच की जा रही है। 


कड़े सुरक्षा घेरे में ईवीएम 
राव ने कहा कि सभी 51 जिलों में स्ट्रॉग रूम की सुरक्षा केन्द्रीय सुरक्षा बल द्वारा 24 घण्टे की जा रही है। इसके साथ ही दूसरा घेरा विशेष सशस्त्र बल द्वारा संपादित किया जा रहा है। सुरक्षा व्यवस्था मतगणना पूर्ण होने तक यथावत रहेगी। स्ट्रॉग रूम में डबल लॉक सिस्टम है, जिसकी एक चाबी जिला निर्वाचन अधिकारी के पास तथा दूसरी चाबी संबंधित क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारी के पास है। केन्द्रीय पुलिस बल स्ट्रॉग रूम की आंतरिक परिधि सुरक्षा व्यवस्था में तैनात है तथा राज्य के सशस्त्र पुलिस बल बाहरी परिधि में सुरक्षा के लिए तैनात हैं।
अभ्यर्थियों कर सकेंगे स्ट्र्रांग रूम की निगरानी
अभ्यर्थियों को स्ट्रांग रूम के सुरक्षा इंतजाम पर गहन नजर रखने के लिए अपने प्रतिनिधियों को तैनात करने के लिए लिखित में सूचना दी गई है। उन्हे आंतरिक परिधि के बाहर रहने की अनुमति दी गई, जहां से वे स्ट्रॉग रूम के प्रवेश द्वार को देख सकें, यदि स्ट्रांग रूम के प्रवेश द्वार को सीधे नहीं देखा जा सकता है तो ऐसी अवस्था में सीसीटीवी की व्यवस्था है जिससे वे स्ट्रांग रूम के प्रवेश द्वार की निगरानी स्क्रीन पर देख सकें। स्ट्रॉग रूम के पास नियंत्रण कक्ष 24 घंटे कार्यशील है। पुलिस अधिकारी के साथ एक राजपत्रित अधिकारी को स्ट्रॉग रूम की सुरक्षा के लिए 24 घंटे ड्यूटी पर रखा गया है।  
सागर और खरगोन में देरी से पहुंची ईवीएम को अलग-अलग रखवाया है। खाली ईवीएम को भी अलग रखा है। इसमें प्रत्याशियों की भी सहमति है। फिलहाल इस मामले में कार्रवाई जैसी स्थिति नहीं बनी है। जिलों में चूक तो हुई है। 


वीएल कांताराव, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, मप्र 




जबलपुर। विधानसभा चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी खुद व उनके प्रतिनिधि स्ट्रांग रूम में रखी ईवीएम की जीवंत तस्वीरें देख सकेंगे। एलएलबी स्कूल के स्ट्रांग रूम पर नजर रखने भितर और बाहर करीब 20 सीसीटीवी कैमरे लगाए हैं। अब जल्द ही स्ट्रांग रूम के प्रवेश द्वार पर बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई जाएगी। ताकि स्ट्रांग रूम में रखी ईवीएम व आस-पास की गतिविधियों पर नजर रखने प्रत्याशियों के प्रतिनिधि स्ट्रांग रूम की जीवंत तस्वीर देख सकें। एमएलबी परिसर में मतगणना तक टेंट लगाकर रहने व निगरानी करने के लिए प्रत्याशियों के प्रतिनिधियों को जगह भी उपलब्ध कराई जाएगी।

कलेक्टर ने लिया जायजा
कलेक्टर व जिला निर्वाचन अधिकारी छवि भारद्वाज ने शुक्रवार को भी एमएलबी स्कूल पहुंचकर स्ट्रांग रूम की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। उन्होंने मतगणना तैयारियों का निरीक्षण कर किया। अधिकारियों को मतगणना तैयारियां 11 दिसम्बर से पहले पूर्ण करने के निर्देश दिए। इस अवसर पर अपर कलेक्टर डॉ.राहुल फटिंग, उपजिला निर्वाचन अधिकारी नमःशिवाय अरजरिया मौजूद रहे।

घरेलू कुकिंग गैस (एलपीजी ) की कीमतों में कमी के चलते आम लोगों को बड़ी राहत मिली है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन के दामों में कमी के असर से शुक्रवार को एलपीजी के दाम 6.52 रुपये प्रति सिलेंडर कम हुए हैं. जबकि, बिना सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर के दाम 133 रुपये कम हुए हैं.


देश की सबसे बड़ी फ्यूल रिटेलर कंपनी, इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन के मुताबिक, अब सब्स‍िडी में मिलने वाले 14.2 किलो वजनी सिलेंडर के लिए एनसीआर(नेशनल केपिटल रीजन) में 500.90 चुकाने होंगे.


बता दें कि इसके लिए पहले उपभोक्ता को पहले 507.42 रुपये चुकाने होते थे. नई कीमतें आज से लागू हो गई हैं.


एलपीजी के दामों में ये कमी जून के बाद से करीब छह महीने की लगातार बढ़ोतरी के बाद दर्ज की गई है. कीमतों में इस गिरावट से पहले तक प्रति सिलेंडर दामों में 14.13 रुपये की बढ़ोतरी देखी गई.


सब्स‍िडी में मिलने वाले एलपीजी के सिलेंडर के दाम में पिछली बार 1 नवंबर को बढ़त देखी गई थी. इस दौरान प्रति सिलेंडर की 2.94 रुपये बढ़ाए गए थे. जिसमें सब्सिडीयुक्त LPG सिलिंडर का दाम 502.40 रुपये से बढ़कर 505.34 रुपये प्रति सिलेंडर हो गया था.



बता दें कि LPG उपभोक्ताओं को बाजार मूल्य पर रसोई गैस सिलेंडर खरीदना होता है. हालांकि, सरकार साल भर में 14.2 किलो वाले 12 सिलेंडरों पर सीधे ग्राहकों के बैंक खाते में सब्सिडी डालती है.


उल्लेखनीय है कि पिछले छह सप्ताह में पेट्रोल के दाम में 9.6 रुपये और डीजल में 7.56 रुपये लीटर की कटौती हुई है.

अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर से तय होते हैं एलपीजी के दाम

एलपीजी की औसत अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क दर और विदेशी मुद्रा विनिमय दर के मुताबिक एलपीजी सिलेंडर के दाम तय होते हैं. जिसके आधार पर सब्सिडी राशि में हर महीने बदलाव होता है. ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार अधिक सब्सिडी देती है और जब कीमतें कम होती है तो सब्सिडी में कटौती की जाती है.

टैक्स नियमों के मुताबिक, रसोई गैस पर जीएसटी ईंधन के बाजार भाव के आधार पर ही तय की जाती है. ऐसे में सरकार ईंधन की कीमत के एक हिस्से को तो सब्सिडी के तौर पर दे सकती है,  लेकिन टैक्स का भुगतान बाजार दर पर ही करना होता है.

इसी के चलते बाजार मूल्य यानी बिना सब्सिडी वाले एलपीजी के दाम में गिरावट से सब्सिडी वाली रसोई गैस पर टैक्स गणना का प्रभाव कम होने से इसके दाम में कटौती हुई है.

कंपनी ने कहा कि दिल्ली में दिसंबर में 2018 में बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर का दाम 942.50 रुपये से कम होकर 809.50 रुपये रह गया. इसमें 133 रुपये की कमी आई है.



इंदौर। हर तरफ से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के पूर्वानुमान सामने आ रहे हैं। इस बीच लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन का कहना है कि हम 200 पार या रिकॉर्ड नहीं बना पा रहे, संभव है कांग्रेस की 5-6 सीटें बढ़ जाएं परंतु सरकार हमारी ही बनेगी। उन्होंने कहा कि लोग शिवराज सिंह से नाराज नहीं हैं। वो सरकारी ढर्रे से नाराज हैं। 

भावांतर के लिए SHIVRAJ नहीं Businessman जिम्मेदार


उन्होंने कहा कि मैंने कभी नहीं कहा कि मुख्यमंत्री के खिलाफ एंटी इंकमबैंसी है। उन्होंने तो मेरे कहने पर पेटलावद में जाकर जनता की नाराजगी भी सही। वे सरल इंसान हैं। सरकारी नीतियों से जुड़े सवाल पर महाजन ने कहा कि किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए भावांतर योजना लाई गई। इस योजना में यदि व्यापारी कुछ गड़बड़ करते हैं तो उसका जिम्मेदार भी सरकार को माना जाता है, ऐसा नहीं होना चाहिए। 

विपक्ष की सीटें बढ़ेंगी परंतु सरकार हमारी ही बनेगी


जब महाजन से पूछा गया कि प्रदेश में कितनी सीटें भाजपा जीतेंगी तो उन्होंने कहा कि मैं यह नहीं कहती कि इस बार 200 पार सीटें होंगी, या पिछली बार का रिकॉर्ड टूटेगा, लेकिन प्रदेश में हमारी सरकार जरूर बनेगी। पिछले चुनाव की अपेक्षा विपक्ष भी पांच-छह सीटें ज्यादा लाता है तो उससे विपक्ष ही मजबूत होगा। इसमें कोई बुराई नहीं है। 

Malwa-Nimad से भी अच्छी सीटें मिलेंगी


मालवा-निमाड़ में संगठन की कमजोर स्थिति से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है। मालवा-निमाड़ से भी अच्छी सीटें मिलेंगी। पूरे प्रदेश में जागरूकता आई है। सरकार ने प्रदेश के हर हिस्से में विकास के काम किए हैं। सतना तरफ भी काफी काम हुए हैं। सरकार बनने में कोई परेशानी नहीं आएगी। संगठन ने मौका दिया तो क्या इस बार फिर आप लोकसभा चुनाव लड़ेंगी, के सवाल पर उन्होंने कहा कि अभी तो मुझे लोकसभा के कुछ सत्र निपटाना है। केंद्र में वर्ष 2019 में भी भाजपा की सरकार ही बनेगी।



भोपाल। मध्यप्रदेश में किसकी सरकार बनेगी यह तो 11 ‍दिसंबर को ही खुलासा होगा, लेकिन मतदान के एक दिन बाद ही लगने लगा है कि यदि कांग्रेस को बहुमत मिला तो मुख्‍यमंत्री पद को लेकर घमासान मचना तय है।

मप्र में फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया ही मुख्‍यमंत्री पद के लिए दो चेहरे हैं, लेकिन बहुमत मिलने की स्थिति में कुछ और चेहरे भी सामने आ सकते हैं। इस बीच, कमलनाथ ने कहा कि वे राज्य के मुख्‍यमंत्री बनना चाहते हैं क्योंकि छिंदवाड़ा की जनता उन्हें मुख्‍यमंत्री के रूप में देखना पसंद करेगी। 

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को राज्य में 150 के लगभग सीटें मिलने जा रही हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री कौन होगा इसका फैसला पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ही करेंगे। उल्लेखनीय है कि राज्य की 230 सीटों के लिए बुधवार 28 नवंबर को करीब 75 फीसदी मतदान हुआ है और दोनों प्रमुख पार्टियां अपनी जीत के दावे कर रही हैं।

भोपाल. मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के लिए 75 फीसदी वोटिंग हुई है। कई जिलों में वोटिंग प्रतिशत 80 फीसदी भी रहा। बढ़ा हुआ मतदान सत्ता परिवर्तन करेगा या सत्तापक्ष को फिर से मौका देगा इसका फैसला 11 दिसंबर को होगा। मतदान बढ़ाने के लिए लगातार प्रदेश में कैंपेन चलाए गए। तो सभी दलों ने लोगों से मतदान करने की अपील की थी। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में एक नारा दिया था 'पहले मतदान फिर जलपान।' पीएम मोदी ने मध्य प्रदेश में 10 रैलियां की और हर रैली में लोगों से अपील करते हुए कहा कि आप पोलिंग बूथ पर जाकर मतदान करें। वहीं, राहुल गांधी ने प्रदेश में कई रैलियां की और लोगों से वोटिंग की अपील की। अगर बात उन क्षेत्रों की जाए जहां पीएम मोदी और राहुल गांधी सरीखे नेताओं ने रैलियां की तो सवाल उठता है उन क्षेत्रों में मतदान बढ़ा या फिर घटा। सबसे पहले बात भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची पहले नंबर के नेता और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की...


दिन 5 रैलियां 10 : मध्यप्रदेश में भाजपा को चौथी बार सत्ता दिलाने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सियासी रण में उतरे। पीएम मोदी ने 16 नवंबर से प्रदेश में चुनावी कैंपेन शुरू किया। उन्होंने प्रदेश की करीब 200 विधानसभा सीटों को कवर करने के लिए 10 रैलियां कीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 16 नवंबर को ग्वालियर और शहडोल, 18 नवंबर को छिंदवाड़ा-इंदौर, 20 नवंबर को झाबुआ-रीवा, 24 नवंबर को मंदसौर-छतरपुर और 25 नवंबर को विदिशा और जबलपुर में चुनावी रैलियों को संबोधित किया।


मोदी की रैली वाले क्षेत्र में वोटिंग का ग्राफ
पीएम मोदी ने मंदसौर जिले में रैली को संबोधित किया। मंदसौर में 2013 में 80.86% फीसदी वोटिंग हुई थी जबकि इस बार मंदसौर में 81.27% फीसदी वोटिंग हुई। 
रीवा में 2013 में 62.49% फीसदी वोटिंग हुई थी 2018 में 67% फीसदी वोटिंग हुई। 
छिंदवाड़ा में 2013 में 78.10% 2018 में 79% फीसदी वोटिंग हुई। 
झाबुआ में 2013 में 54.41% फीसदी वोटिंग हुई थी 2018 में 74% फीसदी मतदान हुआ। 
विदिशा में 2013 में 71.87% वोटिंग हुई तो इस बार 72% प्रतिशत मतदान हुआ। 
जबलपुर कैंट में भी मोदी ने जनसभा की। 2013 में 63.86% फीसदी वोटिंग हुई थी इस बार यहां 67% प्रतिशत मतदान हुआ।



राहुल गांधी ने भी ताबडतोड़ रैलियां : राहुल गांधी ने भी मध्यप्रदेश में ताबडतोड़ रैलियां की। उन्होंने आचार संहिता लगने से पहले ही मध्यप्रदेश के दौरे शुरू कर दिए थे। आचार संहिता लगने के बाद उन्होंने प्रदेश में कई रैलियों को संबोधित किया। उनके द्वारा की गई रैलियों में कई क्षेत्रों में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा तो कई क्षेत्रों में वोटिंग प्रतिशत कम हुआ।


इन क्षेत्रों में बढ़ा वोटिंग प्रतिशत: देवरी विधानसभा सीट पर 2013 में 71.32% फीसदी मतदान हुआ था। इस बार यहां 73% फीसदी मतदान हुआ। 
मंडला में 2013 में 73.78% वोटिंग हुई थी जबकि इस बार यहां 75% मतदान हुआ। 
सागर जिले में 2013 में 64.12% फीसदी वोट पड़े थे जबकि इस बार 65% वोट पड़े हैं। 
दमोह में 71.29% फीसदी मतदान 2013 में हुआ था वहीं, 72% फीसदी वोटिंग 2018 में हुआ।



यहां कम हुई वोटिंग
भोजपुर में 2013 में 71.74% मतदान हुआ था जबकि इस बार 70% वोटिंग हुई है।
बासोदा में 73.51% फीसदी वोटिंग 2013 में हुआ था इस बार यहां कम हुई है इस बार यहां 69% फीसदी वोटिंग हुई है। 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सीट बुदनी में भी राहुल ने सभा को संबोधित किया था लेकिन 2013 के मुकाबले यहां वोटिंग प्रतिशत गिरा है। 2013 में 79.20% इस बार यहां 71% वोटिंग हुई है। 
टीकमगढ़ में 2013 में 72.19 % जबकि इस बार 68% फीसदी वोटिंग हुई है। 
बरघाट विधानसभा में 79.45% 2013 में हुई थी इस बार यहां 71% वोटिंग हुई है।


 


क्या हैं बड़े हुए मतदान के मायने: राजनीति शास्त्र के रिटायर्ड शिक्षक चंद्रिका प्रसाद दुवेद्धी का कहना है, मतदान का बड़ा हुआ प्रतिशत हमेशा सत्ता पक्ष के खिलाफ आक्रोश का प्रदर्शन करता है, लेकिन मतदान के प्रति लोगों की बढ़ रही जागरूकता भी अब वोटिंग प्रतिशत बढ़ने का एक कारण है। बढ़ा हुआ मतदान सत्ता पक्ष के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है तो विपक्ष को भी बैचन करता है। मध्यप्रदेश में इस बार का बढ़ा हुआ वोटिंग प्रतिशत कहीं ना कहीं भाजपा के लिए चिंता का विषय है। जिस तरह से जनता घरों से निकलकर पोलिंग बूथों तक पहुंची है उससे जाहिर है कि वोट बदलाव के लिए किया गया है। हांलाकि उनका यह भी कहना है कि हर बार जरूरी नहीं की बढ़ा हुआ मतदान सत्ता पक्ष के खिलाफ ही जाए 2008 के मुकाबले 2013 में मतदान बढ़ा था पर फायदा सत्ता पक्ष को ही हुआ था।


भोपाल। मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को हुए मतदान का प्रतिशत बढ़ने का सिलसिला थमा नहीं है। कल शाम तक निर्वाचन आयोग ने 75.61 प्रतिशत मतदान का आंकड़ा दिया था, जो गुरुवार शाम तक 74.85 हो गया है।


मध्यप्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव ने गुरुवार शाम को प्रेस कांफ्रेस कर बताया कि अभी सभी पीठासीन अधिकारियों की रिपोर्ट की स्क्रीटनी चल रही है। सभी पोलिंग बूथों के नतीजे आने में अभी कल तक का वक्त लगेगा।


 


कांताराव ने बताया कि मतदान का प्रतिशत अभी और भी बढ़ सकता है। मध्यप्रदेश में कुल 74.85 प्रतिशत मतदान हो चुका है। अनूपपुर मोहड़ी के मतदान केंद्र में गड़बड़ी की शिकायत आई है। इसकी सूचना चुनाव आयोग को भेज दी है। कांताराव ने बताया कि अब तक सभी ईवीएम को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है। पूरे प्रदेश में 72.72 प्रतिशत पुरुष और 73.86 महिलाओं ने मतदान किया।


उन्होंने बताया कि कल तक पूरे प्रदेश के मतदान प्रतिशत में और भी इजाफा हो सकता है। कांताराव ने कहा कि सतना में रीपोल की मांग की गई, लेकिन वहां री पोल की आवश्यकता नहीं है। इससे पहले बुधवार को वोटिंग के बाद 5 बजे हुए प्रेस कांफ्रेस में कांतारावा ने कहा था कि शाम 6 बजे तक 74.61 प्रतिशत रहा। देर रात को भी पोलिंग दल जब पहुंचा तब आंकड़ा बढ़ता गया।


 


यह भी खास
-मध्यप्रदेश में 230 सीटों पर शांतिपूर्ण मतदान पूरा हुआ।
-881 कंट्रोल यूनिट बदले गए।
-2126 वीवीपैड को मोक पोल के दौरान बदलना पड़ा।
-386 शिकायतें प्राप्त हुई। सभी का निराकरण कर दिया। अब 
कोई लंबित नहीं है।
-883 वैलेट यूनिट बदले गए।
-महज एक फीसदी मशीनों को बदला गया।
-74.61 मध्यप्रदेश में शाम 6 बजे तक की स्थिति। यह रात में


और भी बढ़ जाएगी।
-यह प्रतिशत पिछले चुनाव 2013 से अधिक है। 
-कांताराव ने बताया कि सिंधिया के ट्वीट पर जवाब दे दिया है।
-2899 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला 11 दिसंबर को होगा।
-किसी भी पोलिंग बूथ पर कब्जा नहीं हुआ।
-भोपाल में 170 मशीन बदली गईं।
-इंदौर, धार और गुना में तीन अधिकारियों की मौत।
-शुजालपुर के मतदान अधिकारी को निलंबित किया।
-किसी भी बूथ पर रिपोल नहीं हुआ।


पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत का स‍िलस‍िला लगातार जारी है. गुरुवार को भी ईंधन के दाम नीचे आए हैं. आज दाम घटने के बाद पेट्रोल की कीमत जहां 8 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई है. वहीं, डीजल के दाम भी 3 महीने में सबसे कम हो  गए हैं.


पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पिछले 40 दिनों से लगातार राहत मिल रही है. गुरुवार को भी इस राहत  के बूते पेट्रोल 33 पैसे और डीजल 36 पैसे सस्ता हुआ है.


राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल 74 रुपये के नीचे आ गया है. यहां गुरुवार को पेट्रोल 73.24 रुपये प्रति लीटर का मिल रहा है. मुंबई में यह 78.80 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच गया है. कोलकाता में 75.24 रुपये और चेन्नई में 75.24 रुपये प्रति लीटर पर बना हुआ है.


डीजल की बात करें तो इसकी कीमतों में भी राहत है. दिल्ली में एक लीटर डीजल के लिए आपको 68.13 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं. मुंबई में इसकी कीमत 71.33 और चेन्नई में यह 71.95 का प्रति लीटर का मिल रहा है.डीजल


कोलकाता में भी डीजल 69.98 रुपये का है. इस कटौती के साथ दिल्ली में डीजल तीन महीने में सबसे सस्ता हो गया है.


पिछले 6 हफ्तों की बात करें तो  पेट्रोल और डीजल क्रमश: 10 रुपये व 7 रुपये सस्ता हुआ है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जारी नरमी की बदौलत घरेलू स्तर पर भी पेट्रोल और डीजल सस्ता हो रहा है.


केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने की लगातार कोशिश में है। अब सरकार आने वाले विधानसभा चुनाव में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है। कई राज्यों में विधानसभा चुनावों का माहौल है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार ने कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांगों में से एक पर सहमति जता दी है। कर्मचारी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली पर आधारित नई पेंशन योजना (NPS) को पुरानी पेंशन योजना (OPS) से बदलने की मांग कर रहे थे। अब दिल्ली सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को तोहफा देते हुए दिल्ली विधानसभा में नई पेंशन योजना को पुरानी पेंशन योजना से बदलने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है।  दिल्ली विधानसभा में पारित प्रस्ताव के अनुसार 26 नवंबर 2018 को भारत सरकार से आग्रह किया गया कि मोदी सरकार तत्काल प्रभाव से नई पेंशन स्कीम को खत्म करके दिल्ली एनसीआर में काम कर रहे सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बार फिर से सभी सुविधाओं के साथ पुरानी पेंशन स्कीम लागू करें

पुरानी पेंशन योजना के विपरीत नई पेंशन स्कीम कर्मचारियों को निवेश पर गारंटिड रिटर्न या न्यूनतम पेंशन की कोई गारंटी नहीं देता है। एनपीएस पारिवारिक पेंशन या सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। नई पेंशन स्कीम जरूरत पड़ने पर लोन सुविधा प्रदान नहीं करता है। नई पेंशन स्कीम वार्षिक वृद्धि और डीए पर वृद्धि प्रदान नहीं करता है। एनपीएस कर्मचारियों को मेडिकल इमरजेंसी को पूरा करने के लिए अपने पेंशन फंड से पर्याप्त धन वापस लेने की अनुमति नहीं देता है।
एनपीएस कर्मचारियों को शेयर बाजारों और उन ताकतों की दया पर छोड़ देता है जो बाजार में छेड़छाड़ कर रहे हैं। एनपीएस पेंशन फंड से निकासी पर ड्रैकोनियन प्रतिबंध लगाता है। एनपीएस बीमा कंपनियों को सेवानिवृत्ति के बाद भी कम से कम दस साल तक वार्षिकी खरीदने के लिए मजबूर करने के साथ कर्मचारियों का शोषण करने की अनुमति देता है, और संविधान में निहित कल्याणकारी राज्य की भावना के विपरीत चलता है।

भोपाल, - प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान (74.85 फीसदी) ने ब्यूरोक्रेसी को भी गफलत में डाल दिया है। ट्रेंड को समझने में माहिर अफसरों के मतदान के बाद हाव-भाव से ही पता चल जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। राजनीतिक पंडित अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन अफसर मौन हैं। जबकि कर्मचारी कह रहे हैं कि 'वक्त है बदलाव का"।

मंत्रालय सहित राजधानी के तमाम सरकारी भवनों में बैठे वरिष्ठ अफसर चुनावी गणित को सुलझाने में लगे हैं। वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान सरकार की योजनाओं का नतीजा है या जनता की नाराजगी का। कहा जाता है कि अफसर मतदान के बाद आकलन कर पैंतरे बदल लेते हैं। वे परिणाम आने का इंतजार किए बगैर जमावट में जुट जाते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। अफसरों को भी समझ नहीं आ रहा है कि किसे साधें और किसे छोड़ें।

उधर, अपनी मांगों और अपने प्रति सरकार के व्यवहार से नाराज कर्मचारी साफ कह रहे हैं कि वक्त बदल रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान का कारण आक्रोश है और यह आक्रोश भाजपा के खिलाफ है। वे कहते हैं कि प्रदेश में 12 फीसदी कर्मचारी मतदाता हैं, जिनमें से 70 फीसदी ने विरोध दर्ज कराया है। कर्मचारियों का यह भी दावा है कि परिणाम पर किसान और व्यापारी वर्ग की नाराजगी भी दिखाई देगी। उनके लिए योजनाएं बनीं, लेकिन फायदा बिचौलिए उठा ले गए



भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के मतदान के बाद कांग्रेस ने चुनाव आयोग से ईवीएम की निगरानी के लिए अपने कार्यकर्ताओं की तैनाती के लिए अनुमति मांगी है। इसके साथ ही कमलनाथ ने इशारों इशारों में कलेक्टरों को चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि 'सबको ये याद रखना चाहिए कि 11 के बाद 12 तारीख भी आएगी।'

कमलनाथ का कहना है कि 'मैनें प्रदेश के कई अधिकारियों से बात की है और मुझे उन पर विश्वास है कि वो अपने काम और वर्दी की इज्जत रखेंगे। सबको याद रखना चाहिए कि 11 तारीख के बाद 12 तारीख भी आएगी। ईवीएम की निगरानी को लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ का कहना है कि 'हमनें मांग की है, हम इंतजार कर रहे हैं जबाव का, एक जगह तो उन्होंने कहा है कि आज से नहीं कल से करें। पता नहीं, इसमें क्या भेद है। उन्होंने कहा कि 'हम इस पर निगरानी रखेंगे। 

मैनें बहुत सारे अधिकारियों से बात की है, मध्यप्रदेश के जो रिटर्निंग ऑफिसर है, जो अधिकारी है, मुझे उनपर विश्वास है, मुझे विश्वास है कि पुलिस के अधिकारियों पर कि वो अपनी वर्दी की इज्जत रखेंगे। सबको ये याद रखना चाहिए कि 11 के बाद 12 तारीख भी आएगी।

चुनाव प्रचार से अलग रहने पर दिग्विजय सिंह ने तोड़ी चुप्पी.

उन्होंने कहा कि पार्टी के हित में मैं अलग रहा.

मुझे चुनाव प्रचार से अलग रहने को कहा गया था.

भोपाल: मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके सीनियर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह बड़े पैमाने पर इस बार कांग्रेस के चुनावी अभियान से अलग रहे. मध्य प्रदेश में वनवास खत्म करने और जीत की चाह रखने वाली कांग्रेस के चुनावी अभियान से व्यापक तौर पर दिग्विजय सिंह के अलग रहने की वजह अब तक साफ नहीं थी, मगर अब खुद उन्होंने इसका कारण बताया है. 

71 वर्षीय दिग्विजय सिंह ने कहा कि 'मैंने खुद को अभियान से बाहर रखा क्योंकि मुझे मध्यप्रदेश में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करने के लिए कहा गया था. इसलिए मैं दो अभियानों में बाहर रहा. जो कुछ भी मैं कर सकता था, जो भी मुझे करने के लिए कहा गया था, मैंने किया.'

जब दिग्विजय सिंह से पूछा गया कि आखिर 15 सालों से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर क्यों है, तो इस पर उन्होंने 60 लाख फर्जी वोटर का हवाला दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि पांच सालों में एक विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस कोई 'रीयल चुनौती' नहीं दे सकी. फिर जब सवाल पूछा गआ कि आखिर ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा कि लोग अपने क्षेत्र में ज्यादा व्यस्त थे. मगर उन्होंने जोर देकर कहा कि इस बार आपको मैं आश्वस्त कर सकता हूं कि इस बार कांग्रेस जिस तरह से एकजुट थी, ऐसा मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा. उन्होंने आगे कहा कि बीजेपी के खिलाफ एक साथ मिलकर लड़ रहे हैं. 

बता दें कि पिछले महीने एक वीडियो में दिग्विजय सिंह यह कहते हुए सुने गए थे कि वह कोई चुनावी अभियान नहीं करेंगे या भाषण नहीं देंगे, जिससे उनकी पार्टी को नुकसान हो. पार्टी कार्यकर्ताओं से यह कहते हुए वह सुने गए थे कि ' मेरे पास एक काम है. कोई कैंपेनिंग नहीं, कोई भाषण नहीं. मेरे भाषण से कांग्रेस का वोट कटेगा, इसलिए मैं ऐसा नहीं करूंगा. 

दरअसल, दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. साल 2003 में कांग्रेस सत्ता से अलग हो गई थी और 230 सीटों के मुकाबले काग्रेस पार्टी 38 सीटों पर सिमट के रह गई थी. उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने या एक दशक तक राज्य की राजनीति में दखल न देने के लिए शपथ ली. हालांकि, 2013 में उनका यह प्रण पूरा हो गया. इसके बाद दिग्विजय सिंह कई तरह के विवादित बयानों को लेकर मीडिया में छाए रहे. ऐसे कई मौके आए जिनमें उनके बयान को लेकर कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा.

विधानसभा चुनाव तक मतदाताओं के पीछे भागने वाले राजनीतिक दल अब मतगणना एजेंट बनाने के लिए अलग-अलग तरह की जोड़-तोड़ में जुटे हुए हैं। यह जोड़-तोड़ 11 दिसम्बर को होने वाली मतगणना के दौरान गणना कक्ष में अधिक संख्या में अपने समर्थकों को पहुंचाने के लिए हो रही है। इसकी वजह से निर्दलीय प्रत्याशियों की पूछपरख एक बार फिर बढ़ गई है।


कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता स्ट्रांग रूम तक अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को पहुंचाने के लिए निर्दलीय प्रत्याशियों से सीधे संपर्क कर रहे हैं। इसके लिए निर्दलीय प्रत्याशियों को तरह-तरह के ऑफर देने की भी खबरें आ रही हैं।


निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक मतगणना के दिन स्ट्रांग रूम में प्रत्याशियों और उनके अधिकृत एजेंटों को ही प्रवेश दिया जाएगा। इसके लिए विशेष पास बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। ऐसे में कुछ प्रमुख दलों के प्रत्याशी निर्दलीयों से संपर्क कर उनके एजेंट की जगह अपने एजेंटों को मतगणना स्थल पर पहुंचाने के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं। इसके लिए टेबल के हिसाब से कीमत तय हो रही है।




वहीं डाक मतपत्र की गणना के दौरान भी एजेंटों की सबसे अहम भूमिका होती है। राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों की रणनीति यह है कि वो मतगणना स्थल पर अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को रखें, ताकि विवाद की स्थिति में संख्या बल के दम पर दबाव बनाया जा सके।


वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को दी जिम्मेदारी


बताया जाता है कि राजनीतिक दल के उम्मीदवार सीधे तौर पर निर्दलीय प्रत्याशियों से संपर्क करने की जगह उनके पास अपने कार्यकर्ताओं को भेज रहे हैं, ताकि किसी प्रकार की वाद-विवाद की परिस्थितियां उत्पन्न होने पर वो सीधे तौर पर बच सके। कार्यकर्ता ही निर्दलीय प्रत्याशियों से संपर्क कर ऑफर दे रहे हैं।




 


हो सकता है कि कोई


निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे समय में किसी पार्टी को समर्थन देता हो, लेकिन भाजपा को इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती है।
संजय श्रीवास्तव, प्रवक्ता, भाजपा


कांग्रेस किसी भी निर्दलीय उम्मीदवार के अधिकार-पत्र में अपने एजेंट नहीं भेजती है। कांग्रेस उम्मीदवारों के अधिकार-पत्र से ही एजेंटों को भेजा जाएगा।
धनंजय सिंह ठाकुर, प्रवक्ता, कांग्रेस


भोपाल। मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को वोटिंग के बाद अब विश्लेषण और कयासों का दौर शुरू हो गया है। हर मतदाता इसी उधेड़बुन में है कि मध्यप्रदेश में कोई बदलाव होगा या फिर से शिवराज सरकार सत्ता पर काबिज हो जाएगी।


मध्यप्रदेश का भाग्य ईवीएम में बंद हो गया है। 11 दिसंबर को सुबह भाग्य का पिटारा खुल जाएगा। सुबह 11 बजे तक स्पष्ट संकेत मिलने लग जाएंगे कि मतदाताओं ने किस को चुना है।


 


क्या पीएम मोदी की बराबरी करेंगे शिवराज
इस चुनाव के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बनकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी कर लेंगे या कांग्रेस फिर वनवास खत्म करके सत्ता में आ जाएगी। विश्लेषक कहते हैं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह 2005 में मुख्यमंत्री बने थे। मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री बने रहने वाले पहले व्यक्ति हो गए हैं। 
-जबकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी गुजरात के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
-मोदी 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के 11वें मुख्यमंत्री बने थे।
-इसके बाद वे चार बार लगातार मुख्यमंत्री बने रहे।
-7 अक्टूबर 2001 से 22 मई 2014 तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे।
-लंबे समय तक गुजरात का मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड भी मोदी के नाम पर है।
-यदि शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी कर लेंगे।


 


यह है शिवराज का कार्यकाल
-शिवराज सिंह 29 नवंबर 2005 को पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद 2008 में भी भाजपा की वापसी हुई और दोबारा मुख्यमंत्री चुने गए। 12 दिसंबर 2008 को शपथ ली थी।
-2013 में भी शिवराज के नेतृत्व में भाजपा ने तीसरी बार सरकार बनाई। शिवराज ने 13 दिसंबर 2013 को जीत हासिल को शपथ ली थी।


 


तो तीन चौथाई बहुमत मिला था
इधर, विधानसभा चुनाव 2018 में मत प्रतिशत और भी बढ़ गया है। इससे पहले चुनाव में भी शिवराज को जीत मिली थी, तब 7 फीसदी मत ज्यादा मिले थे। इस कारण भाजपा तीन चौथाई बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। इस बार दो प्रतिशत और बढ़ गया है।



यह है 90 प्रतिशत का गेम
इधर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के बयान के बाद भाजपा ने बड़ा दांव खेला था। चुनाव वाले दिन जो विज्ञापन प्रकाशित हुआ उसमें 90 प्रतिशत मतदान की अपील की गई थी। यह जानबूझकर दिया गया था, जिससे कमलनाथ के उस बयान की याद दिलाई जा सके, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुसलमान 90 प्रतिशत मतदान नहीं करेंगे तो कांग्रेस को भारी नुकसान होगा।


भोपाल-प्रदेश में बंपर वोटिंग के बाद दिग्गजों की धडकऩें बढ़ गई हैं। उन्हें यह अंदाजा ही नहीं है कि जनादेश किस ओर गया। नौ मंत्री और सात वर्तमान विधायक चक्रव्यूह में फंस गए हैं। वहीं 50 सीटें ऐसी हैं, जिनका नतीजा कुछ भी हो सकता है। यही सीटें भाजपा और कांग्रेस के लिए सत्ता की कुंजी हैं। इन फंसी सीटों में भाजपा के 34 और कांग्रेस के 15 निवर्तमान विधायक कड़े संघर्ष में हैं।


चार सीटों पर चतुष्कोणीय और 27 पर त्रिकोणीय मुकाबला रहा रोचक


भोपाल. विस चुनाव भाजपा और कांगे्रस के बीच कांटे की टक्कर में आकर फंस गया है। ऐसे में प्रदेश की उन 50 सीटों पर सभी की निगाहें हैं जहां जीत के दावे तो सभी कर रहे हैं। 2013 में इन 50 सीटों में से 34 भाजपा और 15 कांग्रेस के पास थी, एक सीट बसपा के कब्जे में थी। इन सीटों में चार सीटों पर चतुष्कोणीय और 27 पर त्रिकोणीय मुकाबला होने से चुनाव रोचक हो गया है। वहीं 19 सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस-भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है, लेकिन हार-जीता अंदाज लगाना मुश्किल है ।


यह है 50 सीटें


चतुष्कोणीय मुकाबला- अंबाह, भिंड, पथरिया, जबेरा, 
त्रिकोणीय मुकाबला- ग्वालियर ग्रामीण, बमोरी, पृथ्वीपुर, निवाड़ी, खरगापुर, राजनगर, बिजावर, नागौद, अमरपाटन, मउगंज, ब्यौहारी, कोतमा, पुष्पराजगढ़, बरगी, जबलपुर-उत्तर, मुरैना, वारासिवनी, अमरवाड़ा, घोड़ाडोंगरी, बैरसिया, ब्यावरा, राजगढ़, भगवानपुरा, बड़वानी, झाबुआ, मनावर, उज्जैन-उत्तर, सुआसरा।


सीधी लड़ाई, लेकिन कांटे का मुकाबला- श्योपुर, ग्वालियर, चंदेरी, सिंगरौली, जैतपुर, मानपुर, होशंगाबाद, भोजपुर, भोपाल दक्षिण-पश्चिम, आगर, सोनकच्छ, बागली, इंदौर-3, इंदौर-5, महू, बदनावर, बडनगऱ, रतलाम ग्रामीण।


भाजपा और कांग्रेस के 20-20 दिग्गज फंसे चुनावी चक्रव्यूह में


भोपाल. इस बार कई दिग्गजों के सामने कड़ी चुनौती है। भाजपा और कांग्रेस के 20-20 ऐसे दिग्गज नेता हंै जो चुनावी चक्रव्यूह में बुरी तरह से फंस गए हैं। इन सीटों पर परिणाम बहुत कम अंतर से सामने आने की संभावना है। भाजपा के जो दिग्गज फंसे हैं उसमें शिवराज सरकार के 9 मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष भी शामिल हैं। उधर कांग्रेस के 7 वर्तमान विधायक भी संकट का सामना कर रहे हैं।




भाजपा-कांग्रेस को पिछले चुनाव में वोट


चुनाव - भाजपा - कांग्रेस
2013 - 1.51 करोड़ - (44.87%) - 1.23 करोड़ - (36.38)
2008 - 94.93 लाख - (37.64%) - 81.70 लाख़ - (32.39)
2003 - 1.08 करोड़ - (42.50%) - 80.59 लाख - (31.61)
1998 - 1.04 करोड़ - (39.03%) - 1.07 करोड़ - (40.63)
1993 - 91.51 लाख - (38.82%) - 96.19 लाख - (40.81)


कांग्रेस : ये दिग्गज फंसे
रामनिवास रावत- विजयपुर
हेमंत कटारे- अटेर
गोविंद सिंह - लहार
लक्ष्मण ङ्क्षसह- चाचौड़ा
सुरेंद्र चौधरी- नरियावली
यादवेंद्र सिंह- टीकमगढ
विक्रम सिंह नातीराजा- राजनगर
राजेंद्र सिंह- अमरपाटन
बिसाहू लाल- अनूपपुर
संजय मसानी- वारासिवनी
एनपी प्रजापति- गोटेगांव
दीपक सक्सेना- छिंदवाड़ा
सरताज सिंह- होशंागबाद
प्रभुराम चौधरी- सांची
पीसी शर्मा- भोपाल द.प.
सज्जन सिंह वर्मा- सोनकच्छ
बाला बच्चन- राजपुर
हीरा अलावा- मनावर
जीतू पटवारी- राउ
नरेंद्र नाहटा- मंदसौर


भाजपा: ये संघर्ष में
रुस्तम सिंह- मुरैना
अरविंद भदौरिया- अटेर
राकेश चौधरी- भिंड
रसाल सिंह- लहार
जयभान सिंह पवैया- ग्वालियर
अनूप मिश्रा- भितरवार
भूपेंद्र ङ्क्षसह - खुरई
ललिता यादव- मलहरा
जयंत मलैया- दमोह
ब्रजेंद्र प्रताप सिंह - पन्ना
नारायण त्रिपाठी- मैहर
राजेंद्र शुक्ला- रीवा
अजय विश्नोई- पाटन


शरद जैन- जबलपुर उ.
जालम सिंह पटेल- नरसिंहपुर
सीतासरन शर्मा- होशंगाबाद
सुरेंद्र पटवा- भोजपुर
उमाशंकर गुप्ता- भोपाल द.प.
अंतरसिंह आर्य- सेंधवा
आकाश विजयवर्गीय- इंदौर 3


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