केंद्रीय मंत्री का राम मंदिर निर्माण पर बड़ा बयान, सुप्रीम कोर्ट से की यह अपील

लखनऊ. केंन्द्रीय विधि एवं न्यायमंत्री रवि शंकर प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट से राम जन्म भूमि मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में जल्द से जल्द शुरु कराने की अपील की है। वे सोमवार को एमिटी विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के 15वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन के उदघाटन के अवसर पहुंचे थे। अपने संबोधन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील करते हुए कहा कि राममंदिर निर्माण के लिए फास्ट ट्रैक गठन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद इबादत का नहीं, गुलामी का प्रतीक है। आम मुस्लिम भी चाहता है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो, लेकिन कुछ राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के चक्कर में इस पर रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सबरीमाला केस या आतंकी की रिहाई के लिए जब आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुल सकता है, तो 70 साल से विचाराधीन चल रहे मामले पर इतनी शिथिलता क्यों।



तीन तलाक जैसी दकियानूसी प्रथा पर रोक लगनी चाहिए-


रवि शंकर प्रसाद ने कार्यक्रम में तीन तलाक जैसे मामलों पर जारी कानूनी प्रक्रिया पर भी रोशनी डाली। ट्रिपल तलाक मामले पर रविशंकर ने कहा कि 27 दिसंबर को इसके खिलाफ विधेयक संसद में आने वाला है। तीन तलाक कोई धर्म से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि नारी सम्मान और उसके स्वाभिमान से जुड़ा हुआ मुद्दा है। जब दुनिया के 22 देशों ने इसे असंवैधानिक मान लिया है, तो भारत में इस पर रोक क्यों ना लगे? रवि शंकर ने आगे कहा कि जब भारत की महिलाएं अंतरिक्ष पर जा रही हैं, सेना में बड़े पदों पर कार्य कर रही हैं, तो ऐसे में इस दकियानूसी प्रथा पर रोक लगनी चाहिए।



विचारधीन मामलों पर न्यायाधीश द्वारा शीघ्र निस्तारण किया जाए-


रविशंकर प्रसाद ने कार्यक्रम में कहा कि देश के उच्च न्यायालयों में पिछले 10 वर्षो से सिविल, क्रिमनल व कई अन्य मामले विचाराधीन हैं जनकी मॉनिटरिंग मुख्य न्यायाधीश द्वारा कराकर शीघ्र उनका निस्तारण किया जाए। यही नहीं कानून मंत्री ने अधिवक्ता परिषद से जुड़े लगभग 8000 अधिवक्ताओं से गरीबों के वादों का निस्तारण भी शीघ्र, सुलभ व सस्ता किए जाने की अपील करते हुए कहा कि आम गरीब आपको मुवक्किल फीस भले ही न दे पाए, लेकिन उसकी आंखों की आशा व किरण आपको काफी आगे ले जाएगी।


फैसले की कॉपी हिंदी भाषा में दिए जाने के फैसले का स्वागत-


कानून मंत्री ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर के उस निर्णय का स्वागत किया, जिसमें उन्होंने फैसले की कॉपी हिंदी भाषा में दिए जाने की बात कही। साथ ही उन्होंने कहा कि सभी न्यायालयों के क्षेत्रीय भाषाओं में भी फैसले की कॉपी दी जानी चाहिए. कठिन शब्दों का प्रयोग ना करके हिंदी को सरल, सहज, सुलभ भाषा बनाया जाना चाहिए।